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Thursday, 8 September 2011

कालसर्प

कुंडली में कालसर्प,क्या उपाय करे?

kaal_sarpa_310_01यदि किसी कन्या कि कुण्डली कालसर्प दोष से ग्रसित हो जाए तो,उसे स्वपन में सर्प दिखाई देते है। असमंजस की स्थिति रहती है। प्रमोशन ,नौकरी, शादी, संतान सभी क्षेत्रो में देरी एवं परेशानी होती है। ऐसा क्यों होता है? शास्त्र कहता है।

'पूर्व जन्मकृतं पापं व्याधिरुपेण बाधते।

तत् शांतिरोषधैदानै: जप श्राद्धादि कर्मभि:।।

अर्थात् पूर्व जन्म में किए पाप इस जन्म में बाधा उत्पन्न करते हैं। उनकी शांति दान, जाप, श्राद्ध आदि पूजन से होती है। इसलिए पूजन कर्म कर काल सर्प दोष शांत किया जाता है।

जो कोई पूजन कर्म करवाने में सक्षम न हो वह निम्न उपाय द्वारा भी कालसर्प से राहत पा सकता है।

1. यदि स्त्री की कुंडली में कालसर्प दोष है तो उसे पीपल के वृक्ष की तीन सौ दिन में 28 हजार परिक्रमा करनी चाहिए।

2. शिवलिंग पर तांबे का नाग ब्रह्ममुहूर्त में चढ़ाएं। चांदी का नाग-नागीन नदी में बहाएं।

३. नवनाग स्तोत्र का पाठ करें।

४. शिव उपासना लघु रुद्र का पाठ कराएं।

५. बुधवार या शनिवार को भिखारी को कंबल, उड़द, मूंग का दान करें।

६. एक साबूत तरबूज लेकर पानी के किनारे जोर से पटक दें।

७. शनिवार को कुत्ते को बिस्किट खिलाएं।

Wednesday, 10 August 2011

कालसर्प

कालसर्प योग -- कालसर्प योग योग जब बनता है जब की कुंडली में सारे ग्रह राहु - केतु के मध्य हो|अगर एक ग्रह भी इन दोनों से बाहर हो तो कालसर्प योग नहीं बनता है, कुछ ज्योतिषों के अनुसार ये आंशिक कालसर्प होता है जबकि आंशिक कालसर्प योग नामक कोई योग होता ही नहीं है|कई विद्वानों का ये कहना है कि पिछले जन्म में व्यक्ति के हाथ से कोई सर्प मर गया हो तो कुंडली में कालसर्प का निर्माण होता है जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है,कालसर्प योग का दूसरा मतलब पितरी दोष है|आपके पितरो की या आपके पूर्वजो की कुछ इच्छा अधूरी रह गयी है जो वो आपसे उम्मीद करते है की आप पूरी करे जिससे उनका पूरा आश्रीवाद व्यक्ति को मिल सके|वैसे ये योग कुछ कष्टकारी होता है परन्तु इस योग के जातक काफी भाग्यशाली भी होते है| इस योग के कारण उनको उम्मीद से ज्यादा लाभ होता है|  सचिन तेंदुलकर,धीरू भाई अम्बानी जैसे बड़े लोगो की कुंडली में भी कालसर्प नामक योग है, इस योग के कारण ये लोग संघर्ष के साथ इन लोगो ने बुलन्दियो को छुआ है |                                                                                कालसर्प योग 12 तरह के होते है -- (1) अनन्त कालसर्प योग (2) कुलिक कालसर्प योग (3) वासुकी कालसर्प योग (4) शंखपाल कालसर्प योग (5) पद्म कालसर्प योग (6) महा पद्म कालसर्प योग (7) तक्षक कालसर्प योग (8) कुलिक कालसर्प योग (9) शंखनाद कालसर्प योग (10) पातक कालसर्प योग (11) विषाक्त कालसर्प योग (12) शेषनाग कालसर्प योग                                                                                                                                  (1) अनन्त कालसर्प योग -- ये योग राहु लग्न में और केतु सप्तम स्थान में हो जब बनता है | ऐसे जातक मानसिक पीड़ा से ग्रसित रहते है | दुनिया,समाज से इनका कुछ वैर है ऐसा ये सोचते है | इनके विचार दुनिया से कुछ अलग हट कर होते है | इनकी अपने जीवनसाथी के साथ भी कम ही पटती है | इनके परिवार के लोग भी इस व्यक्ति से अपना काम निकलवाने में आगे रहते है जिस कारण से इनका मन और भी विचलित हो जाता है | समाज में इनके मान - सम्मान को कई बार ठेस लगती है | इतना सब होने के बावजूद भी मेरी राय से 36 साल के बाद इनके जीवन में उन्नति के अवसर आते है जिससे इनका जीवन खुशियों से भर जाता है |                                                  (2) कुलिक कालसर्प योग - राहु दुसरे में तथा केतु अष्ठम स्थान में हो तो ये योग बनता है | ऐसे जातक को कुटुंब का सुख नहीं मिलता है,जातक को अपयश का भागी बनना पड़ता है | व्यक्ति को अपने पिता की सम्पति नहीं मिलती है| व्यक्ति का जीवन अपने कुटुंब के ही बीतता है | आर्थिक परेशानियों की वजह से उसका वैवाहिक जीवन परेशानियों से भरा रहता है |ससुराल और जीवनसाथी का सुख भी कम मिलता है | मानसिक परेशानी हमेशा बनी रहती है | व्यक्ति में शारीरिक रूप से कोई न कोई परेशानी रहती है | दुर्घटना और चोट लगने का भय बना रहता है | अगर राहु के साथ दुसरे घर में शनिदेव जी या मंगल जैसे पाप ग्रह बैठ जाये तो ये परेशानिया और भी बढ़ जाती है क्योंकि दूसरा घर मारक भाव भी होता है | परन्तु 36 साल के बाद व्यक्ति जीवन में तरक्की के रास्ते पर चल पड़ता है और फिर उसे यश - मान,समाज में प्रतिष्ठा मिलते है |                                          (3) वासुकी कालसर्प योग - राहु तीसरे घर में तथा केतु नवम घर में हो तो वासुकी नामक कालसर्प योग बनता है | तीसरा घर छोटे भाई - बहनों का और पराक्रम का होता है | छोटे भाई - बहनों से हमेशा वो परेशान रहता है,छोटे भाई - बहन हमेशा अपना मतलब निकालने के चक्कर में रहते है | केतु भाग्य स्थान में होने से भाग्य सम्बन्धी रूकावटे हमेशा आती रहती है | इस कालसर्प योग के कारण व्यक्ति का पराक्रम क्षीण हो जाता है, परिश्रम का पूरा फल भी नहीं मिलता है | अगर राहु के साथ चंद्रमा भी हो तो मानसिक परेशानी भी रहती है | जातक को अपने जन्म स्थान से दूर जाकर कम करना चाहिए | मध्यम आयु के बाद जातक को सफलता मिलती है |                                                                                                                          (4) शंखपाल कालसर्प योग - चोथे भाव में राहु और दसवे भाव में केतु हो तो ये योग बनता है | इस योग के कारण व्यक्ति को माता - पिता का प्यार नहीं मिल पाता है | ज्यादातर भाड़े के घर में ही रहना पड़ता है और बार - बार बदलना पड़ता है, व्यापार में भी रूकावटे आती रहती है | माता के बीमार होने की सम्भावना भी कम रहती है | माँ - पिता के आपस के सम्बन्ध भी उतने अच्छे नही रहते है | सास - ससुर और ससुराल से भी सम्बन्ध अच्छे नहीं रहते है |                                                                                                                                                                                                (5) पद्म कालसर्प योग - इस योग में राहु पांचवे और केतु ग्यारहवे भाव में होते है और सारे ग्रह इन दोनों के बीच में आने से ये योग बनता है | इस योग वाले व्यक्ति की शिक्षा बीच में रुक जाती है, अगर उच्च शिक्षा होती भी है तो पढाई में कई बार विघ्न आते है | माँ और अपने मकान का सुख नहीं मिलता है | समाज में कई बार अपमानित होना पड़ता है | प्यार के चक्कर में पड़कर व्यक्ति अपनी पढाई और अपना समय व्यर्थ में ही बर्बाद कर देता है | शादी के बाद संतान सम्बन्धी परेशानिया रहती है |                                                                                                                                              (6) महापद्म कालसर्प योग - छठे भाव में राहु और बारहवे भाव में केतु हो और इनके मध्य सारे ग्रह आ जाये तो ये योग बनता है | इस योग के कारण व्यक्ति के गुप्त शत्रु होते है, मामा,नाना से सुख नहीं मिल पाता है | शारीरिक व्याधिया लगी रहती है | जीवन में उन्नति के लिए हमेशा तडपते रहता है लेकिन पराधीन होने के कारण कुछ भी नहीं कर पाता है और बिना पानी के मछली जैसे तडपते रहता है | जातक का चरित्र भी दूषित रहता है,अपने परिवार के कारण ही धोखा खाता है | जहरीले जानवरों से उसे भय रहता है, भूत - प्रेत,उपरी हवाओ का भी उसे भय रहता है | नशे की आदत से व्यक्ति को बचना चाहिए | वाहन से दुर्घटना,चोट लगने का भय रहता है |                                                                                                                      (7)तक्षक कालसर्प योग - राहु सप्तम में और केतु लग्न में हो और सारे ग्रह इनके मध्य हो तो ये योग बनता है | ऐसे जातक को पैतृक सम्पति का सुख नहीं मिलता है और अगर मिलता भी है तो वो उसे बर्बाद कर देता है | व्यक्ति मानसिक रूप से उतावला होता है,जातक को भयानक सपने आते है | ऐसे व्यक्ति प्रेम के मामलो में अधूरे ही होते है,प्रेमिका या जिनसे इनका विवाह होता है उनसे इन्हें धोखा ही मिलता है | वैवाहिक जीवन संघर्षमय रहता है,पति - पत्नी के बीच में लड़ाई  होती रहती है | व्यापार में साझेदारी में नुकसान होता है | जुए,सट्टे,शेयर आदि में पैसा लगाने का शौक होता है जिस कारण से धन का आवागमन होता रहता है | गुप्त रोग भी रहते है | कर्जे में डूबा रहता है,दिया हुआ पैसा वापस नहीं मिलता है | इसलिए ऐसे व्यक्तियों को दुसरो का बुरा नहीं करना और सोचना चाहिए |                                                                                                                                                      (8) कर्कोटक कालसर्प \ कुलिक कालसर्प योग - जब राहु आठवे घर में और केतु दुसरे घर में हो और सारे ग्रह इन दोनों के मध्य आ जाये तो ये योग बनता है इस योग के कारण भाग्योदय में रूकावट आती है कुटुंब का सुख नहीं मिलता है,व्यापार में उन्नति नहीं हो पाती है,नौकरी में उन्नति नहीं हो पाती है | बार - बार नौकरी या व्यापार बदलना पड़ता है | शत्रु और रोग से व्यक्ति परेशान रहता है,अकाल मृत्यु की कई बार सम्भावना आती है | दुर्घटना,चोट लगने का,हड्डी टूटने का भी योग रहता है | आठवा घर पत्नी से सुख का भी होता है इस कारण से पत्नी का और ससुराल का सुख नहीं मिलता है यौन सुख का भी अभाव रहता है | अपने परिवार से अलग रहने का योग रहता है,परिवार एवम दोस्तों से धोखा मिलता है |                           (9) शंखनाद \ शंखचुड काल सर्प योग - राहु नवम में और केतु तीसरे भाव में मोजूद हो तो ये योग बनता है | इस योग के कारण जीवन में सुखो की कमी रहती है,कर्जे,बीमारियों से व्यक्ति घिरा रहता है | भाग्य में रूकावटे आती रहती है | नवम स्थान में राहु होने से कही न कही ये पितरी दोष का सूचक भी है | जब अपनी मेहनत से कुछ नहीं मिलता है तो वो दुसरो से छीन कर लेना चाहता है | आत्म - विश्वास की कमी रहती है,पिता का सुख नहीं मिलता है | व्यापार में धोखा और नुकसान मिलता है | सरकारी कामो में,कोर्ट - कचहरी से भी परेशान रहता है | अपनी बहनों और जीजा से भी टकराव रहता है |                                                                                                                                                                                                                 (10)  पातक या घातक कालसर्प योग - दशम भाव में राहु और चोथे भाव में केतु होने से ये योग बनता है | इस योग के कारण सुख में कमी रहती है | जन्म स्थान या जहाँ व्यक्ति रहता है वहां पीपल का पेड़ जरूर होता है | व्यापार में नौकरी में बदलाव होते रहते है,आत्म विश्वास की कमी रहती है | कई बार समाज,परिवार के सामने अपमानित होना पड़ता है | माता - पिता,भाई - बहन का प्यार कम मिलता है | 40 साल के बाद संघर्ष ख़त्म हो जाता है फिर व्यक्ति ऐशो आराम से रहता है |                                                                                                                                              (11) विषधर या विषाक्त कालसर्प योग - राहु एकादश भाव में और केतु पांचवे भाव में हो तो ये योग बनता है | संतान से सुख कम मिलता है | पढाई में विघ्न रहता है,उच्च शिक्षा अधूरी रह जाती है | प्रेम - प्रसंगों के चक्कर में जीवन के शुरूआती साल व्यर्थ ही बिता देता है | संतान देरी से होती है | हृदय सम्बन्धी और पेट सम्बन्धी बीमारिया होती है | याददाश्त कम हो जाती है |                                                                                                   --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------                                                                                                                                                                                                                           कालसर्प योग के प्रभाव को कम करने के लिए उपाय सच्चे मन से करे तो निश्चित ही लाभ मिलेगा | ऐसा मेरा अनुभव है |
 उपाय - सच्चे मन से माता - पिता की सेवा करे |
  हर शनिवार शनिदेव जी के मंदिर में जाकर सरसों का तेल चढ़ाये |                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                        नित्य कच्चा दूध शंकर भगवान को चढ़ाये | 
ॐ राम राहवे नमः इस मन्त्र की एक माला नित्य करे |
महामृत्युंजय मन्त्र की एक माला नित्य करे या  ॐ हों जुम सः इस मन्त्र की एक माला नित्य करे |
हर मंगलवार को हनुमान जी को बुन्दी के लडू चढ़ाये |
कबूतरों,चिडियों,कौओ को नित्य भोजन और दाना दे |
हर शनिवार काली चीजो का दान करे |
गाय को रोटी नित्य दे | 
हनुमान चालीसा और बजरंग बाण का पाठ नित्य करे |
अपने घर की रसोई में सरसों तेल का दीवा शाम को नित्य जलावे |
नासिक त्र्यम्बकेश्वर में कालसर्प योग की शांति करावे |
राम रक्षा स्तोत्र का पाठ नित्य करे |
हनुमान जी और शंकर जी को चमेली का तेल चढ़ावे |

Monday, 1 August 2011

कालसर्प


मूलत: राहु-केतु दोनों ही आधयात्मिक ग्रह हैं। अत: इन ग्रहों के विशेष अधययन की नितांत आवश्यकता है। वास्तव में राहु-केतु ग्रहों का हमारे कार्मिक फल से बहुत गहरा संबंधा है। ये ग्रह जीवन के सूक्ष्म विन्दुओं के ज्यादा निकट हैं। इनका सीधाा संबंधा हमारी चेतना से है। (ये दोनों ग्रह अपना प्रभाव देने में अचूक हैं।

राहु-केतु ग्रहों को छाया ग्रह कहा जाता है, क्योंकि आकाश में ये दोनों ग्रह विन्दुओं के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं। जहां सूर्य और चन्द्र पथ एक-दूसरे से मिलते हैं। उस विन्दु विशेष को राहु-केतु छयाग्रह कहा गया है।

मुख्यत: इन छाया ग्रहों से जातक के आंतरिक स्वभाव का पता चलता है। जिसके अनुसार जातक अपने जीवन को गतिमान कर सकता है। इन ग्रहों की स्पष्ट व्याख्या से व्यक्ति अपने जीवन में आने वाली कठिनाइयों का पूर्वानुमान लगाकर उनसे अपनी सुरक्षा कर सकता है। किन्तु इन छाया ग्रहों के बारे में एक बात सत्य है कि इन ग्रहों द्वारा जीवन में जो भी अनिष्टकारी घटनायें होती है। वे जातक को आधयात्मिक की ओर अग्रसर करती है। कालसर्प योग के प्रमुख भेद

कालसर्प योग मुख्यत: बारह प्रकार के माने गये हैं। आगे सभी भेदों को उदाहरण कुंडली प्रस्तुत करते हुए समझाने का प्रयास किया गया है -

1. अनन्त कालसर्प योग

जब जन्मकुंडली में राहु लग्न में व केतु सप्तम में हो और उस बीच सारे ग्रह हों तो अनन्त नामक कालसर्प योग बनता है। राहु जब लग्न में हो तो जातक धनवान होता है, बलवान होता है साथ-साथ बहुत ही दृढ़ निष्चयी और साहसी होगा। हां इतना जरुर मैंने देखा है कि उसकी पत्नी का स्वास्थ्य हमेषा प्रतिकूल रहता है। परन्तु वे अपने पुरुषार्थ से अच्छी सफलता पाते हैं।

उपाय:

सूर्योदय के बाद तांबे के पात्र में गेहूं, गुड़, भर कर बहते जल में प्रवाह करें। संतान कष्ट हो तो काला और सफेद कम्बल गरीब को दान करें।
प्रतिदिन एक माला '्र नम: शिवाय' मंत्रा का जाप करें। कुल जाप संख्या 21 हजार पूरी होने पर शिव का रुद्राभिषेक करें।
कालसर्पदोष निवारक यंत्रा घर में स्थापित करके उसका नियमित पूजन करें।
नाग के जोड़े चांदी के बनवाकर उन्हें तांबे के लौटे में रख बहते पानी में एक बार प्रवाहित कर दें।
प्रतिदिन स्नानोपरांत नवनागस्तोत्रा का पाठ करें।
राहु की दशा आने पर प्रतिदिन एक माला राहु मंत्रा का जाप करें और जब जाप की संख्या 18 हजार हो जाये तो राहु की मुख्य समिधा दुर्वा से पूर्णाहुति हवन कराएं और किसी गरीब को उड़द व नीले वस्त्रा का दान करें।
हनुमान चालीसा का 108 बार पाठ करें।
श्रावण मास में 30 दिनों तक महादेव का अभिषेक करें।
शनिवार का व्रत रखते हुए हर शनिवार को शनि व राहु की प्रसन्नता के लिए सरसों के तेल में अपना मुंह देखकर उसे शनि मंदिर में समर्पित करें।
2 कुलिक कालसर्प योग

राहु दूसरे घर में हो और केतु अष्टम स्थान में हो और सभी ग्रह इन दोनों ग्रहों के बीच में हो तो कुलिक नाम कालसर्प योग होगा। इस भाव में राहु हमेषा जातक को दोहरे स्वभाव का बनाता है। अत्याधिक आत्मविष्वास के कारण अनेकों प्रकार की परेषानियों का सामना इन्हें करना पड़ता है। प्रियजनों का विरह झेलना पड़ता है। कई बार इस जातक को पाइल्स की षिकायत भी देखी गई है। कारण की केतु अष्टम स्थान में है। परन्तु एक बात मैंने देखी है कि केतु यहां पर मेष, वृष, मिथुन, कन्या और वृष्चिक राषि में हो तो जातक के पास धन की कमी नहीं होती। ऐसे व्यक्तियें को विरासत में बहुत धरोहर मिलती है।

उपाय:

चांदी की ठोस गोली सफेद धागे में हमेषा गले में धारण करें। केसर का तिलक लगाना भी आपके लिए शुभ होगा।
सरस्वती जी की एक वर्ष तक विधिवत उपासना करें।
देवदारु, सरसों तथा लोहवान को उबालकर उस पानी से सवा महीने तक स्नान करें।
शुभ मुहूर्त में बहते पानी में कोयला तीन बार प्रवाहित करें।
3. वासुकी कालसर्प योग

राहु तीसरे घर में और केतु नवम स्थान में और इस बीच सारे ग्रह ग्रसित हों तो वासुकी नामक कालसर्प योग बनता है।यदि तीसरे भाव में राहु और नवम भाव में केतु तो जातक के पास धन-दौलत और वैभव की कोइ कमी नहीं रहती। स्त्री सुख अनुकूल रहता है साथ ही मित्र भी हमेषा सहयोग के लिए तैयार रहते हैं। परंतु अपने से छोटे भाइयों से इनका हमेषा विरोध रहता है। परन्तु पिता से अच्छी निभती है और पिता का आज्ञाकारी पुत्र भी होता है। तृतीय भाव में राहु हो तो ऐसे वयक्ति धर्म के माध्यम से धन अर्जित करते हैं और बहुत ही प्रसिध्द होते हैं। विदेश यात्रा करते हैं, व देश विदेश में यश प्राप्त करते हैं जैसे मुरारी बापू।

उपाय:

चवल, दाल और चना बहते पानी में प्रवाह में करें। साथ ही मकान के मुख्य द्वार पर अंदर-बाहर तांबे का स्वस्तिक या गणेष जी मूर्ति टांग दें।
नव नाग स्तोत्रा का एक वर्ष तक प्रतिदिन पाठ करें।
प्रत्येक बुधवार को काले वस्त्रा में उड़द या मूंग एक मुट्ठी डालकर, राहु का मंत्रा जप कर भिक्षाटन करने वाले को दे दें। यदि दान लेने वाला कोई नहीं मिले तो बहते पानी में उस अन्न हो प्रवाहित करें। 72 बुधवार तक करने से अवश्य लाभ मिलता है।
महामृत्युंजय मंत्रा का 51 हजार जप राहु, केतु की दशा अंतर्दशा में करें या करवायें।
किसी शुभ मुहूर्त में नाग पाश यंत्रा को अभिमंत्रिात कर धारण करें।
शुक्ल पक्ष के प्रथम शनिवार से व्रत प्रारंभ कर 18 शनिवारों तक व्रत करें और काला वस्त्रा धारण कर 18 या 3 माला राहु के बीज मंत्रा का जाप करें। फिर एक बर्तन में जल दुर्वा और कुशा लेकर पीपल की जड़ में चढ़ाएं। भोजन में मीठा चूरमा, मीठी रोटी, समयानुसार रेवड़ी तिल के बने मीठे पदार्थ सेवन करें और यही वस्तुएं दान भी करें। रात में घी का दीपक जलाकर पीपल की जड़ में रख दें। नाग पंचमी का व्रत भी अवश्य करें।
नित्य प्रति हनुमान चालीसा का 11 बार पाठ करें और हर शनिवार को लाल कपड़े में आठ मुट्ठी भिंगोया चना व ग्यारह केले सामने रखकर हनुमान चालीसा का 108 बार पाठ करें और उन केलों को बंदरों को खिला दें और प्रत्येक मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में बूंदी के लड्डू का भोग लगाएं और हनुमान जी की प्रतिमा पर चमेली के तेल में घुला सिंदूर चढ़ाएं। ऐसा करने से वासुकी काल सर्प योग के समस्त दोषों की शांति हो जाती है।
श्रावण के महीने में प्रतिदिन स्नानोपरांत 11 माला '्र नम: शिवाय' मंत्रा का जप करने के उपरांत शिवजी को बेलपत्रा व गाय का दूध तथा गंगाजल चढ़ाएं तथा सोमवार का व्रत करें।
4. शंखपाल कालसर्प योग

राहु चौथे स्थान में और केतु दशम स्थान में हो इसके बीच सारे ग्रह हो तो शंखपाल नामक कालसर्प योग बनता है। यदि राहु यहां उच्च का हो षुभ राषि वाला हो तो सभी सुखों से परिपूर्ण होता है। और जातक की कुंडली में षुक्र अनुकूल हो तो विवाह के बाद कारोबार और धन में वृध्दि होती है। साथ ही यदि चंद्रमा लग्न में हो तो आर्थिक तंगी कभी नहीं रहती। इस जातक को 48 वर्ष की आयु में बृहस्पति का उत्तम फल प्राप्त होता है। परन्तु फिर भी सफलता के लिए इन्हें विघ्नों का सामना करना पड़ता है। लेकिन केतु दषम भाव में मेष, वृष, कन्या और वृष्चिक राषि में है तो और भी उत्तम फल प्राप्त होता है एवं शत्रु चाह कर भी हानि नहीं पहुंचा सकता। चतुर्थ में राहु व दशम में केतु हो तो ऐसे व्यक्ति राजनिति में उतार चढ़ाव रहते हुए राजनिति में अच्छी सफलता पाते हैं। जैसे मुलायम सिंह जी, चौधरी चरण सिंह। ऐसे व्यक्तियों को दूसरे साथीयों से न चाहते हुए भी सहयोग प्राप्त होता है

उपाय:

गेहूं को पीले कपड़े में बांध कर जरुरतमंद व्यक्ति को दान दें। 400 ग्राम धनियां बहते पानी में प्रवाह करें।
अनुकूलन के उपाय -
शुभ मुहूर्त में मुख्य द्वार पर चांदी का स्वस्तिक एवं दोनों ओर धातु से निर्मित नाग चिपका दें।
नीला रुमाल, नीला घड़ी का पट्टा, नीला पैन, लोहे की अंगूठी धारण करें।
शुभ मुहूर्त में सूखे नारियल के फल को जल में तीन बार प्रवाहित करें।
हरिजन को मसूर की दाल तथा द्रव्य शुभ मुहूर्त में तीन बार दान करें।
18 शनिवार का व्रत करें और राहु,केतु व शनि के साथ हनुमान की आराधना करें। लसनी, सुवर्ण, लोहा, तिल, सप्तधान्य, तेल, धूम्रवस्त्रा, धाूम्रपुष्प, नारियल, कंबल, बकरा, शस्त्रा आदि एक बार दान करें।
5. पद्म कालसर्प योग

राहु पंचम व केतु एकादश भाव में तथा इस बीच सारे ग्रह हों तो पद्म कालसर्प योग बनता है। पंचम भाव में राहु व ग्यारहवें भाव में केतु अध्यात्म की ओर प्रेरित करता है। उत्तम परिवार वाला, आर्थिक स्थिति मजबूत साथ ही उत्तम गुणा एवं भोग से युक्त होता है। केतु ग्यारहवें घर में सम्पूर्ण सिध्दि व सफलता प्राप्त कराता है परन्तु इस योग में संतान पक्ष थोड़ा कमजोर रहता है। साथ ही जातक अपने भाइयों के प्रति थोड़ा कलहकारी होता है। 21 या 42 वर्ष की अवस्था में पिता को थोड़े कष्ट की सम्भावना रहती है। यह जातक आर्थिक दृष्टि से बहुत मजबूत होता है, समाज में मान-सम्मान मिलता है और कारोबार भी ठीक रहता है यदि यह जातक अपना चाल-चलन ठीक रखें, मध्यपान न करें और अपने मित्रकी सम्पत्ति को न हड़पे तो उपरोक्त कालसर्प प्रतिकूल प्रभाव लागू नहीं होते हैं। पंचम में राहु व एकादश में केतु हो तो ऐसे व्यक्ति सफल राजनितिक होते हैं। ऐसे व्यक्तियों को उतार चढ़ाव आते हैं परन्तु सफलता व यश अच्छा प्राप्त होता है। अधिकतर बड़े राजनितिज्ञों में यह कालसर्प योग पाया जाता है। जैसे नारायण दत्त तिवारी, राम विलास पासवान, शीला दिक्षित, शंकर राव चौहान आदि के जिवन से आप सब परिचित हैं। क्योंकि यह भाव पूर्व जन्मों से सम्बंधित होते हैं। पंचम और एकादश यह दोनो भाव ऐसे हैं राहु केतु कहीं भी बैठें हमेशा अच्छी ही सफलता मिलती है। ऐसे व्यक्तियों को उदर (पेट) के माध्यम से शरिरिक कष्ट आता है।

उपाय:

रात को सोते समय सिरहाने पांच मुलियां रखें और सवेरे मंदिर में रख आएं। संतान सुख के लिए दहलीज के नीचे चांदी की पत्तर रखें।
किसी शुभ मुहूर्त में एकाक्षी नारियल अपने ऊपर से सात बार उतारकर सात बुधवार को गंगा या यमुना जी में प्रवाहित करें।
सवा महीने जौ के दाने पक्षियों को खिलाएं।
शुभ मुहूर्त में सर्वतोभद्रमण्डल यंत्रा को पूजित कर धारण करें।
नित्य प्रति हनुमान चालीसा पढ़ें और भोजनालय में बैठकर भोजन करें।
शुभ मुहूर्त में मुख्य द्वार पर चांदी का स्वस्तिक एवं दोनों ओर धातु से मिर्मित नाग चिपका दें।
शयन कक्ष में लाल रंग के पर्दे, चादर तथा तकियों का उपयोग करें।
6. महापद्म कालसर्प योग

राहु छठे भाव में और केतु बारहवे भाव में और इसके बीच सारे ग्रह अवस्थित हों तो महापद्म कालसर्प योग बनता है। इस योग में राहु को छटे स्थान में बहुत ही प्रषस्त अनुभव किया गया है। सम्पत्ति, वाहन, दीर्घायु, सर्वत्र विजय, साहसी, बहादुर और उच्च प्रवाह का होता है। लोगों को बहुत सहयोग करता है। यहां तक की फांसी के फंदे से बचा कर लाने की क्षमता होती है। परंतु स्वयं कभी निरोग नहीं रहता। अनेको प्रकार की बिमारियों का सामना करना पड़ता है। यदि जातक को सट्टे या जुए की आदत लग जाए तो बर्बाद हो जाता है। आंखों की बिमारी से दूर रहना चाहिए। राहु छठे में और केतु द्वादश में हो तो ऐसे व्यक्ति धर्म से जुड़े होते हैं सभी प्रकार की प्रतिस्पर्धा में अच्छी सफलता पाते हैं तथा दान पुण्य और दूसरों की मदद में अपना सब कुछ लुटाने को ततपर रहते हैं। जैसे पं जवाहर लाल नेहरु।

उपाय:

गणेष जी की उपासना सर्वमंगलकारी सिध्द होगी।
श्रावणमास में 30 दिनों तक महादेव का अभिषेक करें।
शुक्ल पक्ष के प्रथम शनिवार से शनिवार व्रत आरंभ करना चाहिए। यह व्रत 18 बार करें। काला वस्त्रा धारण करके 18 या 3 राहु बीज मंत्रा की माला जपें। तदन्तर एक बर्तन में जल, दुर्वा और कुश लेकर पीपल की जड़ में डालें। भोजन में मीठा चूरमा, मीठी रोटी समयानुसार रेवड़ी, भुग्गा, तिल के बने मीठे पदार्थ सेवन करें और यही दान में भी दें। रात को घी का दीपक जलाकर पीपल की जड़ के पास रख दें।
इलाहाबाद (प्रयाग) में संगम पर नाग-नागिन की विधिवत पूजन कर दूध के साथ संगम में प्रवाहित करें एवं तीर्थराज प्रयाग में संगम स्थान में तर्पण श्राध्द भी एक बार अवश्य करें।
मंगलवार एवं शनिवार को रामचरितमानस के सुंदरकाण्ड का 108 बार पाठ श्रध्दापूर्वक करें।

7. तक्षक कालसर्प योग

केतु लग्न में और राहु सप्तम स्थान में हो तो तक्षक नामक कालसर्प योग बनता है। इस योग में जातक बहुत ही उंच्चे सरकारी पदों पर काम करता है। सुखी, परिश्रमी और धनी होता है। वह अपने पिता से बहुत ही प्यार करता है और साथ ही बहुत सहयोग करता है। लक्ष्मी की कोई कमी नहीं होती है लेकिन जातक स्वयं अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने वाला होता है। यदि अपनी संगत अच्छे लोगों के साथ रखे तो अच्छा रहेगा। गलत संगत की वजह से परेषानी भी आ सकती है यदि यह जातक अपने जीवन में एक बात करें कि अपना भलाई न सोच कर ओरों का भी हित सोचना शुरु कर दें साथ ही अपने मान-सम्मान के fy, दूसरों को नीचा दिखाना छोड़ दें तो उपरोक्त समस्याएं नहीं आती।

उपाय:

11 नारियल बहते पानी में प्रवाह करें।
कालसर्प दोष निवारण यंत्रा घर में स्थापित करके, इसका नियमित पूजन करें।
सवा महीने जौ के दाने पक्षियों को ख्लिाएं।
देवदारु, सरसों तथा लोहवान - इन तीनों को उबालकर एक बार स्नान करें।
शुभ मुहूर्त में बहते पानी में मसूर की दाल सात बार प्रवाहित करें और उसके बाद लगातार पांच मंगलवार को व्रत रखते हुए हनुमान जी की प्रतिमा में चमेली में घुला सिंदूर अर्पित करें और बूंदी के लड्डू का भोग लगाकर प्रसाद वितरित करें। अंतिम मंगलवार को सवा पांव सिंदूर सवा हाथ लाल वस्त्रा और सवा किलो बताशा तथा बूंदी के लड्डू का भोग लगाकर प्रसाद बांटे।
8. कर्कोटक कालसर्प योग

केतु दूसरे स्थान में और राहु अष्टम स्थान में कर्कोटक नाम कालसर्प योग बनता है। इस योग में जातक उदार मन, समाज सेवी और धनवान होता है। परंतु वाणी पर संयम कभी नहीं रहता। साथ ही परिवार वालों से कम ही पटती है। साथ ही अपने कार्यों को बदलते रहता है। षिक्षा में समस्या आती है। साथ ही जातक हमेषा निंदा का पात्र होता है।

उपाय:

चांदी का चकोर टुकरा हमेषा अपनी जेब में रखें।
हनुमान चालीसा का 108 बार पाठ करें और पांच मंगलवार का व्रत करते हुए हनुमान जी को चमेली के तेल में घुला सिंदूर व बूंदी के लड्डू चढ़ाएं।
काल सर्प दोष निवारण यंत्रा घर में स्थापित कर उसका प्रतिदिन पूजन करें और शनिवार को कटोरी में सरसों का तेल लेकर उसमें अपना मुंह देख एक सिक्का अपने सिर पर तीन बार घुमाते हुए तेल में डाल दें और उस कटोरी को किसी गरीब आदमी को दान दे दें अथवा पीपल की जड़ में चढ़ा दें।
सवा महीने तक जौ के दाने पक्षियों को खिलाएं और प्रत्येक शनिवार को चींटियों को शक्कर मिश्रित सत्ताू उनके बिलों पर डालें।
अपने सोने वाले कमरे में लाल रंग के पर्दे, चादर व तकियों का प्रयोग करें।
किसी शुभ मुहूर्त में सूखे नारियल के फल को बहते जल में तीन बार प्रवाहित करें तथा किसी शुभ मुहूर्त में शनिवार के दिन बहते पानी में तीन बार कोयला भी प्रवाहित करें।
9. शंखचूड़ कालसर्प योग

केतु तीसरे स्थान में व राहु नवम स्थान में शंखचूड़ नामक कालसप्र योग बनता है। योग में जातक दिर्घायु, साहसी, यषस्वी और धन-धान्य से परिपूर्ण होता। दाम्पत्य सुख बहुत ही अनुकूल रहता है। सर्वत्र विजय और सम्मान पाता है। परन्तु इस जातक का चित हमेषा अस्थिर रहता है।

उपाय:

राहु और केतु के बीज मंत्रों का जाप करें।
अनुकूलन के उपाय -
इस काल सर्प योग की परेशानियों से बचने के लिए संबंधिात जातक को किसी महीने के पहले शनिवार से शनिवार का व्रत इस योग की शांति का संकल्प लेकर प्रारंभ करना चाहिए और उसे लगातार 18 शनिवारों का व्रत रखना चाहिए। व्रत के दौरान जातक काला वस्त्रा धारण करके राहु बीज मंत्रा की तीन या 18 माला जाप करें। जाप के उपरांत एक बर्तन में जल, दुर्वा और कुश लेकर पीपल की जड़ में डालें। भोजन में मीठा चूरमा, मीठी रोटी, रेवड़ी, तिलकूट आदि मीठे पदार्थों का उपयोग करें। उपयोग के पहले इन्हीं वस्तुओं का दान भी करें तथा रात में घी का दीपक जलाकर पीपल की जड़ में रख दें।
महामृत्युंजय कवच का नित्य पाठ करें और श्रावण महीने के हर सोमवार का व्रत रखते हुए शिव का रुद्राभिषेक करें।
चांदी या अष्टधातु का नाग बनवाकर उसकी अंगूठी हाथ की मध्यमा उंगली में धारण करें। किसी शुभ मुहुर्त में अपने मकान के मुख्य दरवाजे पर चांदी का स्वस्तिक एवं दोनों ओर धातु से निर्मित नाग चिपका दें।

10. घातक कालसर्प योग

केतु चतुर्थ तथा राहु दशम स्थान में हो तो घातक कालसर्प योग बनाते हैं। इस योग में जातक परिश्रमी, धन संचयी व सुखी होता है। राजयोग का सुख भोगता है। दषम राहु राजनिती में अवष्य सफलता दिलाता है। मनोवांछित सफलताएं मिलती है। यदि शनि अनुकूल बैठा हो तो। परन्तु जातक हमेषा अपनी जन्म भूमि से दूर रहता है। माता का स्वास्थ्य प्रतिकूल रहता है। सब कुछ होने के बाद भी जातक के पास अपना सुख नहीं होता है।

उपाय:

हर मंगलवार का व्रत करें और 108 हनुमान चालीसा का पाठ करें।
त्य प्रति हनुमान चालीसा का पाठ करें व प्रत्येक मंगलवार का व्रत रखें और हनुमान जी को चमेली के तेल में सिंदूर घुलाकर चढ़ाएं तथा बूंदी के लड्डू का भोग लगाएं।
एक वर्ष तक गणपति अथर्वशीर्ष का नित्य पाठ करें।
शनिवार का व्रत रखें और लहसुनियां, सुवर्ण, लोहा, तिल, सप्तधान्य, तेल, काला वस्त्रा, काला फूल, छिलके समेत सूखा नारियल, कंबल व हथियार आदि का समय-समय पर दान करते रहें।
नागपंचमी के दिन व्रत रखें और चांदी के नाग की पूजा कर अपने पितरों का स्मरण करें और उस नाग को बहते जल में श्रध्दापूर्वक विसर्जित कर दें।
शनिवार का व्रत करें और नित्य प्रति हनुमान चालीसा का पाठ करें। मंगलवार के दिन बंदरों को केला खिलाएं और बहते पानी में मसूर की दाल सात बार प्रवाहित करें।
11. विषधर कालसर्प योग

केतु पंचम और राहु ग्यारहवे भाव में हो तो विषधर कालसर्प योग बनाते हैं। इस योग में जातक 24 वर्ष की अवस्था के बाद सफलता प्राप्त करता है। आर्थिक स्थिति अच्छी रहेगी। ग्यारहवें भाव में राहु हमेषा अनुकूल फल प्रदान करता है। उचित व अनुचित दोनों तरीकों से धन की प्राप्ति होती है। दाम्पत्य सुख बहुत ही अनुकूल रहता है। संतान सुख की कोई कमी नहीं रहती। परंतु प्रथम संतान को अवष्य कष्ट मिलता है।

उपाय:

घी का दीपक जला कर दुर्गा कवच और सिद्कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें।
श्रावण मास में 30 दिनों तक महादेव का अभिषेक करें।
नागपंचमी को चांदी के नाग की पूजा करें, पितरों का स्मरण करें तथा श्रध्दापूर्वक बहते पानी या समुद्र में नागदेवता का विसर्जन करें।
सवा महीने देवदारु, सरसों तथा लोहवान - इन तीनों को जल में उबालकर उस जल से स्नान करें।
प्रत्येक सोमवार को दही से भगवान शंकर पर - '्र हर हर महादेव' कहते हुए अभिषेक करें। ऐसा केवल सोलह सोमवार तक करें।
सवा महीने जौ के दाने पक्षियों को खिलाएं।
12. शेषनाग कालसर्प योग



केतु छठे और राहु बारहवे भाव में हो तथा इसके बीच सारे ग्रह आ जाये तो शेषनाग कालसर्प योग बनता है। इस योग में जातक हमेषा अपनी मेहनत और सूझ-बुझ से सफलता हासिल करता है। परंतु बहुत जरुरी है अपने आचरण को संयमित रखना। संतान पक्ष प्रबल होता है। दीर्घायु होता है। परन्तु ननिहाल पक्ष से हमेषा खटपट लगी रहती है।

उपाय:

काले और सफेद तील बहते जल में प्रवाह करें। किसी भी मंदिर में केले का दान करें।
किसी शुभ मुहूर्त में '्र नम: शिवाय' की 11 माला जाप करने के उपरांत शिवलिंग का गाय के दूध से अभिषेक करें और शिव को प्रिय बेलपत्रा आदि सामग्रियां श्रध्दापूर्वक अर्पित करें। साथ ही तांबे का बना सर्प विधिवत पूजन के उपरांत शिवलिंग पर समर्पित करें।
हनुमान चालीसा का 108 बार पाठ करें और मंगलवार के दिन हनुमान जी की प्रतिमा पर लाल वस्त्रा सहित सिंदूर, चमेली का तेल व बताशा चढ़ाएं।
किसी शुभ मुहूर्त में मसूर की दाल तीन बार गरीबों को दान करें।
सवा महीने जौ के दाने पक्षियों को खिलाने के बाद ही कोई काम प्रारंभ करें।
काल सर्प दोष निवारण यंत्रा घर में स्थापित करके उसकी नित्य प्रति पूजा करें और भोजनालय में ही बैठकर भोजन करें अन्य कमरों में नहीं।
किसी शुभ मुहूर्त में नागपाश यंत्रा अभिमंत्रिात कर धारण करें और शयन कक्ष में बेडशीट व पर्दे लाल रंग के प्रयोग में लायें।
शुभ मुहूर्त में मुख्य द्वार पर अष्टधातु या चांदी का स्वस्तिक लगाएं और उसके दोनों ओर धातु निर्मित नाग चिपका दें तथा एक बार देवदारु, सरसों तथा लोहवान इन तीनों को उबाल कर स्नान करें।




केतु एक धवजा भी है। किन्तु धवजा का अर्थ पतका या झंडा नही है। केतु को धवजा कहने का अर्थ है कि केतु परमात्मा की शक्ति का मूर्त रूप है। जिसके प्रभाव और चेतना से मनुष्य इस सृष्टि में व्याप्त उस सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी शाक्ति का अनुभव कर सकता है।

Saturday, 16 July 2011

Kala Sarpa Dosha


Remedies of  Kala Sarpa Dosha

Kala Sarpa dosha plays an important role in the native's life. If a native is under the influence of Kala Sarpa dosha, the native may face sudden rise and fall in the life. He faces most evil effects that may lead even to death. This dosha may cause the native to be separated from his family life, loss of huge wealth and fame, sudden danger to life, and even the native may also indulge in unlawful and unethical activities.
Kala Sarpa dosha is generally believed that one of the karmic dosha that may run across the generations. The best example to the best of knowledge is Jawahar Lal Nehru's family that we witnessed. A combination of remedies and ethical, simple living on the part of natives can overcome the dosha.
Regular performance of santi pooja on Shahsti Thithi and chanting the 108 names of Lord Nataraj and occasional visits to temples like Sri Kalahasti in Andhra Pradesh and Tirunageswaam may help the native.
A holy dip in river in Rameswaram and offer oblations to ancestors will help in removing the curses of piturs if that is the reason for the dosha running in the family.
Do not do any harm to snakes and other reptiles and chanting the names of 9 major dynastical heads of serpents 21 times on Shahsti Thithis will be a powerful remedy. Do leave a snake in the forests on Amavasya day. If possible, install a five-hooded Sarpa Raja made of silver, offer turmeric mixed raw rice, chant the mantras, and keep the same in Lord Subramanyeswara Swamy temple.
Worship of Maanasaa Devi is a powerful remedy for any dosha arising out of curse of serpents.

Other General Remedies

1. Japam has to be performed separately for Kuja, Rahu and Ketu.
2. Visit Rahu Temple situated In Tamilnadu Tirunageswram and perform milk abishekam in Rahukalam after performing this, visit Vaideeswaran koyal (Kuja Temple) and then Ketu temple in Peroambare and perform pooja.
3. It is advisable to visit Srikalahasthi, Andhra Pradesh, India and perform pooja for Kalasarpa Dosha Nivarana and perform Pooja to Goddess Gyana Prasunamba with kumkum.
4. Those who are not financially sound may perform pooja to Lord Subramaneswara Swami temple for a minimum of seven Tuesdays.
5. Ware a ring made of silver in the form of Sarpa. The same should be worn to the point finger. Purohits at Triambkeswar near Nasik are renowned for remedies to Kala Sarpa Dosha.
6. Wear Gomedika or Vaiduryam (cats eye) made of silver and wear the same in Middle finger.
7. Naga padaga made of silver and donate it to a Brahmin in Lord Siva Temple after performing Ekadasa Rudrabhishekam to reduce negative effects.

Perform Naga pooja

The following mantras have to be chanted for 21 days regularly
  • Om Aaathishesha naagaayanamaha
  • Om Avantha nagaaya namaha
  • Om Vaasugiye Namaha
  • Om Thatcha naagaaya namaha
  • Om Kaarkodaka naagaaya namaha
  • Om Padma naagaaya namaha
  • Om Mahaa Padma Naagaaaya Namaha
  • Om Sanka naagaya namaha
  • Om Kuiga nagaaya namaha
The idol of snake may be gifted with new clothes, betel leaves and other auspicious items to a Vedic Brahmin at the sixth consecutive Shahsti Thithi pooja will overcome all curses due to the Naga dosha or Kala Sarpa dosha.

कालसर्प योग

अनंत कालसर्प योग  ( Ananta Kal sarp Yog ):- kalasarpa yog kaalsarpa yog
जब लग्न में राहु और सप्तम भाव में केतु हो और उनके बीच समस्त अन्य ग्रह इनके मध्या मे हो तो अनंत कालसर्प योग बनता है । इस अनंत कालसर्प योग के कारण जातक को जीवन भर मानसिक शांति नहीं मिलती । वह सदैव अशान्त क्षुब्ध परेशान तथा अस्‍िथर रहता है: बुध्दिहीन हो जता है। मास्‍ि‍तक संबंधी रोग भी परेशानी पैदा करते है।
कुलिक कालसर्प योग ( Kulik Kal sarp Yog ) :- Kalasarpa yog kaalsarpa yog
जब जन्‍मकुंडली के व्दितीय भाव में राहु और अष्टम भाव में केतू हो तथा समस्त उनके बीच हों, तो यह योग कुलिक कालसर्प योंग कहलाता है।
वासुकि कालसर्प योग ( Vasuki Kal sarp Yog ):- . Kalasarpa yog kaalsarpa yog
जब जन्मकुंडली के तीसरे भाव में राहु और नवम भाव में केतु हो और उनके बीच सारे ग्रह हों तो यह योग वास‍ुकि कालसर्प योग कहलाता है।
शंखपाल कालसर्प योग ( Shankhapal Kal sarp Yog ) :-   Kalasarpa yog kaalsarpa yog
जब जन्मकुंडली के चौथे भाव में राहु और दसवे भाव में केतु हो और उनके बीच सारे ग्रह हों तो यह योग शंखपाल कालसर्प योग कहलाता है।
पद्म कालसर्प योग  ( Padma Kal sarp Yog ):- Kalasarpa yog kaalsarpa yog
जब जन्मकुंडली के पांचवें भाव में राहु और ग्याहरहवें भाव में केतु हो और समस्त ग्रह इनके बीच हों तो यह योग पद्म कालसर्प योग कहलाता है।
महापद्म कालसर्प योग ( Maha Padma Kal sarp Yog ):- Kalasarpa yog kaalsarpa yog
जब जन्मकुंडली के छठे भाव में राहु और बारहवें भाव में केतु हो और समस्त ग्रह इनके बीच कैद हों तो यह योग महापद्म कालसर्प योग कहलाता है।
तक्षक कालसर्प योग ( Takshak Kal sarp Yog ):- .Kalasarpa yog kaalsarpa yog
जब जन्मकुंडली के सातवें भाव में राहु और केतु लग्न में हो तथा बाकी के सारे इनकी कैद मे हों तो इनसे बनने वाले योग को तक्षक कालसर्प योग कहते है।
कर्कोटक कालसर्प योग- (  Karkautak Kal sarp Yog ):-. Kalasarpa yog kaalsarpa yog
जब जन्मकुंडली के अष्टम भाव में राहु और दुसरे भाव में केतु हो और सारे ग्रह इनके मध्य मे अटके हों तो इनसे बनने वाले योग को कर्कोटक कालसर्प योग कहते है।
शंखनाद कालसर्प योग  ( Shankhanad Kal sarp Yog ) :- Kalasarpa yog kaalsarpa yog
जब जन्मकुंडली के नवम भाव में राहु और तीसरे भाव में केतु हो और सारे ग्रह इनके मध्य अटके हों तो इनसे बनने वाले योग को शंखनाद कालसर्प योग कहते है।
पातक कालसर्प योग  ( Patak Kal sarp Yog ):- Kalsarpa yog kaalsarpa yog
जब जन्मकुंडली के दसवें भाव में राहु और चौथे भाव में केतु हो और सभी सातों ग्रह इनके मध्य मे अटके हों तो यह पातक कालसर्प योग कहलाता है।
विषाक्तर कालसर्प योग ( Vishadhar Kal sarp Yog ):- Kalsarpa yog kaalsarpa yog
जब जन्मकुंडली के ग्याहरहवें भाव में राहु और पांचवें भाव में केतु हो और सारे ग्रह इनके मध्य मे अटके हों तो इनसे बनने वाले योग को विषाक्तर कालसर्प योग कहते है।
शेषनाग कालसर्प योग ( Shesnag Kal sarp Yog ):- Kalasarpa yog kaalsarpa yog
जब जन्मकुंडली के बारहवें भाव में राहु और छठे भाव में केतु हो और सारे ग्रह इनके मध्य मे अटके हों तो इनसे बनने वाले योग को शेषनाग कालसर्प योग कहते है।