तुला राशि पर साढ़ेसाती का प्रभाव जब गोचर के शनिदेव कन्या राशि में प्रवेश करते हैं तो तुला राशि के जातकों के लिए साढ़ेसाती आरंभ हो जाती है। शनिदेव के कन्या से वृश्चिक राशि तक का भ्रमणकाल तुला राशि वालों के लिए साढ़ेसाती की अवधि होती है। साढ़ेसाती के प्रथम चरण में जब शनिदेव कन्या राशि में विराजमान होते हैं तब अपनी तीसरी दृष्टि से वृश्चिक, सप्तम दृष्टि से मीन तथा दशम दृष्टि से मिथुन राशि को देखते हैं। साथ ही चन्द्र कुंडली से शनिदेव के द्वादश भाव में रहने के कारण इस दौरान संबंधित व्यक्ति के मानसिक रोगो में बढ़ोत्तरी होती है। चंद्र राशि से द्वादश भाव से शनिदेव के गोचरवश उसके अंदर पागलपन, आोश, अतिोध में वृध्दि होगी। इस अवधि में जातक का मन घर में नहीं लगता जिसके कारण वह घर से दूर रहना चाहता है और शांति की खोज में भ्रम वश कई तरह के व्यसनों को पाल लेता है। वह गांजा, शराब, भांग आदि नशीली चीजों का छूटकर प्रयोग करने लगता है। निम्न स्तर के लोगों के साथ रहने की प्रवृत्ति इन्हें नीच कर्म करने को भी प्रेरित करती है। कई बार इस अवस्था में संबंधित लोग गृह त्याग कर किसी अनजान स्थान में भी चले जाते हैं। चूंकि योगकारक ग्रह चतुर्थेश व पंचमेश शनिदेव द्वादश भाव से गोचर कर रहे हैं। अगर जन्मकुंडली में गोचर के शनिदेव चंद्र कुंडली के ग्रहों से पीड़ित हों, शनिदेव किसी नीच या प्रतिकूलग्रह (ग्रह नीच,ऊंच या पाप नहीं होते यह ज्योतिषिय शैली है समझाने की) या वी ग्रह से दृष्ट हाें तो इस दौरान संबंधित व्यक्ति अचानक किसी दुर्घटना का शिकार हो जाता है। यदि शनिदेव का संबंध चंद्र से बने तो इस अवधि में जल में डूबने, मंगल से बने तो विद्युत के झटके लगने आदि की दुर्घटनाएं भी हो सकती हैं। इनको कारोबार में भी उचित लाभ नहीं मिल पाता तथा व्यवसाय में बार-बार घाटा होता है। कई बार तो लगायी पूंजी भी लौटनी मुश्किल हो जाती है। परिणामस्वरूप एक कारोबार से निराश हो कर ये लोग दूसरे कारोबार में लग जाते हैं। लेकिन सभी को एक साथ संभाल नहीं पाते। परिणाम स्वरूप इनकी आर्थिक स्थिति दिनोंदिन दयनीय होती जाती है। जिससे दैनिक परेशानी बनी रहती है। इनकी स्त्री प्राय: रोग ग्रसित रहती है। चूंकि शनिदेव बुध की उच्च राशि से गोचर कर रहे हैं। इन लोगों को लेखन, संपादन, प्रकाशन आदि कार्यों में सफलता प्राप्त होती है। लेकिन इस प्रकार की स्थितियों के लिए संबंधित जातक-जातिका के निजकृत कर्म ही मूल आधार होते हैं। श्री शनिदेव अपनी तरफ से किसी को परेशान नहीं करते। मित्रो, ऊपर आपने जो कुछ भी पढ़ा पुन: कर्म प्रधान विश्व करि राखा, जो जस करहिं तस फल चाखा इस सिद्धांत को ध्यान में रखकर पुन: पढ़ना क्योंकि सबकुछ कर्मों का खेल है कर्मों के आधार पर ही आपकी जन्मकुंडली में शनि विराजमान हैं। शनिदेव अनुकूलन के उपाय - शनिवार को पीपल के वृक्ष के चारों ओर 7 बार कच्चा सूत लपेटते हुए शनिदेव के किसी मंत्र का जप करते रहने से निजकृत कर्मों के कारण मिल रहे प्रतिकूल फलों से मुक्ति मिल जायेगी। सूत लपेटने के बाद पीपल का पूजन व दीपक समर्पित करना जरूरी है। इस दिन एक समय बिना नमक का भोजन करना चाहिए।
- नित्य सूर्योदय के समय सूर्यदर्शन करते हुए 7 बार अथवा 21 बार इस मंत्र का जाप करने से शनिदेव प्रसन्न होकर सभी बाधाएं दूर कर देते हैं।
सूर्यपुत्रो दीर्घदेही विशालाक्ष: शिवप्रिय:। मन्दचार: प्रसन्नात्मा पीड़ां हरतु मे शनि:॥ - प्रत्येक शनिवार को बंदरों को केला, मीठी खील, गुड़ एवं देशी चने खिलाने से भी निजकृत कर्मों के कारण मिल रहे प्रतिकूल प्रभावों का शमन होता है।
- विशेष परेशानी में प्रतिदिन रविवार को छोड़कर ग्रहपीड़ा निवारण शनिदेव के यंत्र का दशरथकृत शनिदेव के स्तोत्र का पाठ करते हुए तेल से अभिषेक व पूजन करें।
- लोहे के बरतन में आठ किलो सरसों का तेल भरकर उसमें अपना चेहरा देखकर उस तेल को शनिदेव के मंदिर में ले जायें और स्नानोपरांत गीले कपड़ों में ही शनिदेव की प्रतिमा का विधिवत तेलाभिषेक करें।
- मछलियों को उड़द के आटे की छोटी-छोटी गोली बनाकर खिलाएं। चूंकि कन्या पृथ्वी तत्व राशि है, इससे पृथ्वी तत्व शांत होकर शनिदेव अनुकूल फल देता है।
ढाई वर्ष के पश्चात शनिदेव जब तुला राशि में प्रवेश करते हैं तो तुला राशि के जातकों के लिए साढ़ेसाती का दूसरा चरण आरंभ हो जाता है। इस राशि में बैठे शनिदेव अपनी तीसरी दृष्टि से धनु राशि, सप्तम दृष्टि से मेष तथा दशम दृष्टि से कर्क राशि को देखते हैं। तुला राशि के स्वामी शुक्र हैं जो शनिदेव के मित्र ग्रह हैं, धनु राशि के स्वामी गुरु, शनिदेव के सम ग्रह हैं, मेष राशि के स्वामी मंगल हैं जो शनिदेव के शत्रु ग्रह हैं तथा कर्क राशि के स्वामी चन्द्र हैं जो शनिदेव के सम ग्रह हैं। परिणाम स्वरूप इस दौरान जातक को लोहे से संबंधित कारोबार में लाभ मिलता है। जातक अपने पिता के द्वारा अर्जित मान-सम्मान को बढ़ाते भी हैं। मनोरंजन-खेल-तमाशे व यात्रा के प्रति उनकी रुचि बढ़ जाती है। जातक समाज के उच्च वर्गों में मान और आदर का पात्र होता है। शुभ कर्म और पूजा-पाठ, ध्यान-साधना का अभ्यास ये लोग ज्यादा करते हैं। इस अवधि में उत्पन्न हुई संतान अति शुभकारी होती है। ऐसे लोग समाज सेवा और पूजा पाठ में अधिक समय देते हैं। अपने साहस और श्रम से ये बहुत सफलता अर्जित करते हैं। ऐसे लोग समाज में कुशल नेतृत्वकर्ता माने जाते हैं। ये अपने कठिन प्रयास और सतत प्रयत्न से उन्नति का मार्ग पाने में सफल होते हैं तथा उपकार के काम में भी ज्यादा अर्थ व्यय करते हैं। शनिदेव के अनुकूलन के उपाय - प्रतिदिन स्नानोपरांत शिवलिंग पर लघु मृत्युंजय मंत्र का जाप करते हुए जल व बेलपत्र चढ़ाएं। जल में दूध व गंगाजल जरूर मिलाएं।
- शनिवार का व्रत करें और बंदरों और कुत्तों को लड्डू खिलाएं।
- नित्य प्रति हनुमान चालीसा का पाठ करें एवं शनिवार को शनिदेव का तैलाभिषेक करें तथा सूर्योदय से पहले बड़ व पीपल के वृक्ष के नीचे सरसाें तेल का दीपक जलाकर उसकी दूध, धूप-दीप आदि से पूजा करें।
- दशरथकृत शनिदेव के स्तोत्र का पाठ हर शनिवार को करें और नित्य प्रति हनुमान चालीसा, बजरंगबाण या रामायण के सुंदरकांड का पाठ करें।
- शुवार को भिगोये काले चने शनिवार को कच्चे कोयले, हल्दी व लोहे की पत्ती को एक साथ एक काले वस्त्र में बांधकर पानी में मछलियों के मध्य डाल दें। प्रत्येक शनिवार को एक वर्ष तक उक्त यिा करने से निजकृत कर्मों की वजह से मिल रहीं बाधाएं शांत हो जाती हैं। मछली खाने वाले व्यक्ति प्रयोग काल में मछली का सेवन न करें। इस प्रयोग को मोतीदान कहते हैं।
पाँच वर्ष पश्चात् वृश्चिक राशि में जब शनिदेव पहुंचेंगे है तो उस समय शनिदेव की साढ़ेसाती का तीसरा चरण आरंभ होता है। इस समय शनिदेव अपने शत्रु मंगल की राशि में स्थित होते हैं जिससे व्यक्ति के स्वभाव में परिवर्तन होने लगता है। उसके दाम्पत्य सुख में भी कमी आती है। उसमेंर् ईष्या, ोध व कटुता की भावना बढ़ जाती है। वादा करके मुकर जाना उसका स्वभाव बन जाता है। ऐसे लोगों में प्रतिशोध की भावना भी प्रबल हो जाती है। लोभ के कारण व्यक्ति बुरे से बुरा कर्म करने पर ऊतारु जाता है। विरोधी पक्ष हर संभव बदला लेने के लिए तैयार रहता है और अंत में सफल भी होता है। यदि जातक की आयु 18 से 24 के बीच हो तो उसे असाध्य रोगों का सामना करना पड़ता है। ये लोग तामसी भोजन करते हैं और इनकी प्रकृति भी वैसी ही होती है। इस दौरान ऐसा भी देखा गया है कि जातक को गलत मार्गों से अर्थ की प्राप्ति होती है। चूंकि शनिदेव की शत्रु राशि धन भाव में है जिससे शनिदेव गोचर कर रहे हैं। उसके ननिहाल पक्ष को कष्ट का सामना करना पड़ता है। अनैतिक संबंध और पर-स्त्री गमन उनके दुख का कारण बनता है। ऐसे लोग अच्छे पद के लिए बराबर प्रयत्नशील रहते हैं और कुछ हद तक सफलता भी प्राप्त करते हैं। ये कुलघाती, कुटुम्ब विरोधी, ोधी और रोग ग्रसित होते हैं। शनिदेव के पाप ग्रह युक्त होने से धन की काफी हानि होती है। यदि ग्रहों का शुभ प्रभाव हो तो तो व्यक्ति संपन्न और संतान की तरफ से सुखी होता है। ऐसे लोग कम धन वाले, मंद बुध्दि, झूठ बोलने वाले, द्रव्यरहित तथा कामी होते हैं। इनके भाई समय पर साथ छोड़ देते हैं। मित्रों से अक्सर धोखा और विश्वास घात मिलता है। इन्हें वाहन सुख भी प्राप्त होता है। विद्या अध्ययन करने वालों को भी अक्सर परेशानी का सामना करना पड़ता है। वास्तव में संबंधित जातकों को उनके पूर्वकृत कर्मों के अनुरूप ही फल प्राप्त होते हैं और शनिदेव वर्तमान क्रियमाण कर्मों में सुधार करने से अधिकाधिक अनुकूल फल प्रदान करता है। शनिदेव के अनुकूलन के उपाय - घर में प्रात:काल व सायंकाल दीप, धूप जरूर जलाएं और 'ॐ नम: शिवाय:' के पाठ का उच्चारण करें। सायंकाल में शनिदेव मंत्र 'ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नम:' का यथाशक्ति जाप करें।
- तुला राशि में शनिदेव उच्च के होते हैं। तुला राशि के स्वामी शुक्र हैं। शनिदेव, शुक्र आपस में मित्र हैं। शुक्र जल तत्व ग्रह है और शुक्र को दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य से संबंध जोड़ा जाता है। साढ़ेसाती आरंभ होने पर ऐसे व्यक्तियों को स्वास्थ्य व मानसिक परेशानियां बढ़ जाती हैं। इसके लिए मछलियों को आटे की छोटी-छोटी गोली बनाकर खिलायें या रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े डालें।
- प्रत्येक शनिवार का व्रत रखें और लोहे के बर्तन में श्रध्दानुसार सरसों का तेल भरकर उसमें अपना मुंह देखकर उसे किसी शनिदेव के मंदिर में दान करें व तेल से बनी वस्तुएं खिलाएं। शुक्र सजने-संवरने आदि का द्योतक होता है। इसलिए अपना पहना हुआ अच्छा साफ-सुथरा कपड़ा किसी जरूरतमंद को भोजन कराने के बाद दान करें।
- व्यवसाय संबंधी समस्याओं के निवारण के लिए शनिदेव की प्रतिमा का सोमवार, मंगलवार व शनिवार को सरसों के तेल से अभिषेक करें उक्त पौराणिक मंत्र का 108 बार जाप वहीं बैठकर करें।
नीलांजनं समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्। छायामार्तण्ड सम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥ - शुक्र ग्रह के देवता लक्ष्मी जी हैं। इसलिए व्यवसाय में यदि ज्यादा परेशानी आ रही हो तो लक्ष्मी नारायण भगवान को मुकुट सहित पोशाक चढ़ाएं और दशरथकृत शनिदेव के स्तोत्र का पाठ करें।
- यदि संबंधित जातक के पूर्वकृत अशुभ कर्मों के फलस्वरूप सप्तम स्थान में अनिष्टकारी शनिदेव हो और ऐसा जातक मदिरा पान करता हो तथा अपने कर्मों के प्रति लापरवाह हो तो वह अविलंब अपने कर्मों में सुधार लायें व मदिरापान तुरंत छोड़ दें, अन्यथा उसे कष्ट प्राप्ति से कोई भी रोक नहीं सकेगा। इन्हें शनिदेव वैदिक मंत्र का जाप दो माला सुबह शाम अवश्य करना चाहिए।
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