दश महाविद्या
आद्य भवानी देवी पार्वती से ही दश महाविद्या का प्राकट्य हुआ है. इनकी आराधना करने प़र धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है.
यह साधना, साधक अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार करते है किन्तु कुछ विशेष करने के लिए दीक्षा का विधान है जो की सिद्ध गुरु के दिशा निर्देशन में ही करना चाहिए. दीक्षा प्राप्ति के लिए दो कुल है - श्री कुल और काली कुल.
काली, तारा, षोडशी और भुवनेश्वरी ये चार महाविद्या है. भैरवी, छिन्नमस्ता और धूमावती ये तीन विद्याये है. .बगुलामुखी, मातंगी और कमला ये तीनो सिद्ध विद्द्यायें है.
काली, तारा, भुवनेश्वरी, और छिन्नमस्ता की दीक्षा काली कुल में दी जाती है और देवी के शेष स्वरूपों की दीक्षा श्री कुल में दी जाती है.
दश महाविद्दया का पूजन करते समय भगवान् शिव की आराधना करना अति आवश्यक है.
काली - इन्हें आद्य महाविद्या और भगवान् विष्णु की योगनिद्रा भी कहते हैं. कहते है कि जब चाँद मुंड से युद्ध करते हुए देवी का मुख अधिक क्रोध के कारण काला हो जाता है जिससे महाकाली का प्रादुर्भाव हुआ. अन्य वृतांत के अनुसार जब श्री विष्णु योगनिद्रा में थे तब मधु और कैटभ नाम के दैत्यों ने ब्रहम्मा जी को खाने के लिए उन प़र आक्रमण किया. उन्होंने भगवान को अत्यधिक पुकारा किन्तु वह सोये रहे तब उन्होंने भगवती की आराधना की. भगवान् विष्णु के नेत्रों से काली स्वरुप प्रकट होकर दैत्यों का संघार करती है.
तारा - इन्हें नील सरस्वती, उग्र तारा , उग्र तारिणी और उग्र चंडा भी कहते है. यह वाक् सिद्धि और मोक्ष प्रदान करने वाली देवी हैं. हयग्रीव का वध करने के लिए देवी काली ने नीला स्वरुप ग्रहण किया था.
षोडशी - इन्हें त्रिपुर सुंदरी भी कहते है. यह धन और ज्ञान दोनों से साधक को परिपूर्ण करती है.
भुवनेश्वरी - सृष्टि का चक्र तीन स्तंभों प़र है - जन्म, पोषण और मृत्यु. उत्पत्ति के क्रम में षोडशी स्वरुप की सत्ता कार्यरत होती है. संघार शक्ति देवी काली है और समस्त विश्व के पोषण और सञ्चालन में देवी भुवनेश्वरी की शक्ति का स्वरुप क्रियाशील होता है.
छिन्नमस्तिका - देवी पार्वती अपनी सखियों के साथ स्नान करने गयी थी. देवी के मन में सृष्टि निर्माण की इच्छा हो गयी जिसकी वजह से उनका रंग काला पड गया और अधिक समय व्यतीत हो गया . देवी की सहचरियों को भूख का आभास होता है और वो भोजन के लिए देवी से प्रार्थना करती है. तब देवी अपनी तलवार से अपना शीश काट कर अपने हाथ प़र रख लेती है और उनके धड से निकल रही रक्त की लहरों का पान स्वयं उनका शीश और सहचरियां करती है.
त्रिपुर भैरवी - महिषासुर का वध करने के लिए देवी के इस घोर स्वरुप का अवतरण हुआ.
धूमावती - इन्हें अलक्ष्मी भी कहते है क्योंकि यह धनहीन है और पति रहित होने के कारण विधवा भी कही जाती है , मार्कंडेय पूरण के अनुसार ये विधवा नहीं बल्कि कुमारी है. एक बार इन्होने प्रतिज्ञा की कि जो कोई भी मुझे युद्ध में परास्त कर देगा वही मेरा पति होगा किन्तु उन्हें कोई भी परास्त नही कर पाया.
मातंगी - इन्हें उच्छिष्ट चंडालिनी , राजमातंगी, सुमुखी, वश्य्मातांगी और कर्ण मातंगी भी कहते हैं. इन्हें मातंग ऋषि कि कन्या ब्र्हम्यामल में बताया गया है.
इनकी आराधना से वाणी सिद्ध होती है.
कमला -असुरों और देवताओं द्वारा किये गए समुद्र मंथन से देवी लक्ष्मी का प्रादुर्भाव हुआ. इनकी कृपा से सब कुछ प्राप्त हो जाता है.
नीचे दी हुई तालिका में प्रत्येक देवी के भैरव , विष्णु अवतार और ग्रहों के लिए प्रतिनिधि स्वरुप बताया गया है
| महाविद्या | गृह | भैरव | विष्णु अवतार | |
|---|---|---|---|---|
| 1 | काली | शनि | महाकाल | श्री कृष्ण |
| 2 | तारा | गुरु | मतस्य | |
| 3 | छिन्नमस्ता | राहु | क्रोध भैरव | नरसिंह |
| 4 | षोडशी | बुध | कामेश्वर | परशुराम |
| 5 | भुवनेश्वरी | चन्द्र | त्रयम्बक | वामन |
| 6 | भैरवी | लग्न | दक्षिण मूर्ति | बलराम |
| 7 | धूमावती | केतु | - | वाराह |
| 8 | बगलामुखी | मंगल | मृत्युंजय | श्री कूर्म |
| 9 | मातंगी | सूर्य | मातंग / सदाशिव | श्री राम |
| 10 | कमला | शुक्र | विष्णु | बुद्ध |
|---|

No comments:
Post a Comment