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Saturday, 6 August 2011

जैन आगम के आलोक में द्वादश भाव, भावेश की अरिष्ट शांति के उपाय



  1. यदि आपके शरीर में प्रायः कर नित्य नये रोग बने रहते हों, सिरदर्द हायपर टेन्शन आदि मस्तिष्क संबंधी बीमारी हो, स्मरण शक्ति कमजोर हो। जीवन में सदा संघर्ष की स्थिति बनी रहती हो। अधिक परिश्रम में कम सफलता मिलती हो या सफलता ही नहीं मिलती हो तो ध्यान रखें आपकी कुंडली में प्रथम भाव या प्रथमेश दूषित है। उपरोक्त प्रतिकूलता की शांति हेतु प्रतिदिन श्री नवग्रह शांति चालीसा अवश्य करें।
  2. यदि जीवन में हमेशा अर्थाभाव रहता हो। परिश्रम करके भी पर्याप्त द्रव्य लाभ नहीं होता हो, वाणी में तुतलाहट-कर्कशता हो। छोटी-छोटी बातों में बड़े-बड़े झगड़े, वाद-विवाद होते हों। नेत्र रोग की पीड़ा हो। विशेष दांया नेत्र कमजोर हो। भाग्योन्नति के क्षण सामने आकर भी हाथ से निकल जाते हों तो समझ लीजिए आपकी कुंडली में दूसरा भाव व द्रव्याधिपति ग्रह पीड़ित है। उसकी शांति हेतु श्री नवग्रह शांति चालीसा, श्री नवग्रह शांति विधान शीघ्र फलदाता सर्वोत्तम उपाय है।
  3. यदि आप हमेशा भयभीत रहते हों। अचानक डर जाते हों, रात्रि में अधिकतर डरावने स्वप्न आते हों, जीवन में बार-बार प्राणान्तक दुर्घटनायें आती हों, बार-बार एक्सीडेन्ट हो, फ्रेक्चर हो, बड़े भाई बहिन आदि परिवार हमेशा प्रतिकूल रहता हो तो जानिये आपका तृतीय पराक्रम भाव व पराक्रमेश पीड़ित है। उपरोक्त अरिष्ट की शांति श्री नवग्रह शांति चालीसा के नित्य पाठ करने से व श्री नवग्रह शांति विधान करने से हो सकती है।
  4. यदि जीवन में भूमि, भवन, वाहन सुख न हो। हमेशा माँ से झगड़ा होता हो या हमेशा माँ बीमार रहती हो। हमेशा यायावर की तरह किराये के मकान में ही रहना पड़ता हो, स्वयं के मकान में भयानक वास्तु दोष हो, व्यापार में पर्याप्त लाभ न हो, जीवन में सुख कम और दुःख ज्यादा आते हों। हृदय रोग की सम्भावना हो तो यह चतुर्थ भाव और चतुर्थेश की प्रतिकूलता का परिणाम है। श्री नवग्रह शांति चालीसा के नित्य पाठ एवं नवग्रह शांति विधान से प्रतिकूलतायें भी अनुकूलता में बदल सकती हैं।
  5. यदि विद्यादेवी-सरस्वती हमेशा आपसे रुष्ट रहती हो अर्थात शिक्षा के क्षेत्र में परिश्रम करके भी मनवांछित सफलता नहीं मिले। पढ़ने में रुचि नहीं बनती हो। उच्च पद की प्राप्ति में बाधायें आती हों, संतान प्राप्ति में विघ्न आते हों, संतान हमेशा बीमार रहती हो या शत्रु भाव रखती हो, दुर्गुणी, व्यसनी हो। स्वयं का पेट संबंधी रोग हो तो यह आपके पंचम, शिक्षा, संतान भाव तथा भावेश की प्रतिकूलता को दर्शाता है। उपरोक्त अरिष्ट की शांति श्री नवग्रह शांति चालीसा एवं श्री नवग्रह शांति विधान के माध्यम से हो सकती है।
  6. यदि मामा पक्ष ही शत्रुता रखता हो, बार-बार विवाद और विवादों में पराजय ही मिलती हो। बार-बार कोर्ट कचहरी के विवादों में जीवन उलझ गया हो। अपने निकट संबंधी ही दुश्मन बन जाते हों। कमर दर्द, स्लीप डिस्क की समस्या हो। प्राणघात बीमारी से जीवन खोखला बन गया हो। बार-बार ऑपरेशन हो रहा हो। तो यह षष्ठम् भाव और षष्ठेश की प्रतिकूलता दर्शाता है। उपरोक्त समस्याओं का सर्वोत्तम निदान श्री नवग्रह शांति चालीसा, श्री नवग्रह शांति विधान है।
  7. दाम्पत्य जीवन रूपी गाड़ी में पति-पत्नी ही मुख्य धुरी होते हैं। यदि हमेशा पति-पत्नी में अनबन रहती हो। यदि वैवाहिक संबंधों में विलम्ब हो रहा हो। पति-पत्नी के आपसी कलह से संबंध विच्छेद का प्रसंग आ गया हो, जीवन के हर कार्य में निरंतर अपयश, असफलता मिलती हो। जीवन स्वच्छंद, निरंकुश प्रवृत्ति की ओर अधिक झुका हो। प्रत्येक स्त्री-पुरुष के प्रति मन में दूषित अनुचित भावनायें उत्पन्न होती हों। गुर्दा या मूत्राशय संबंधी रोग हो तो जान लीजिए आपका सप्तम भाव और सप्तमेश दोनों ही प्रतिकूल हैं। इसकी शांति का एकमात्र उपाय श्री नवग्रह शांति चालीसा, श्री नवग्रह शांति विधान ही हो सकता है।
  8. यदि जीवन में बार-बार एक्सीडेंट, भूकम्प, अग्निकांड, तूफान, बाढ़, आंधी आदि प्राणघातक संकट आते हों। स्वप्न में या साक्षात सर्पादि विषैले प्राणी, गुस्से में काटने दौड़ते हों। ब्लड कैंसर, बोन कैंसर आदि कैंसर रोग की संभावना हो। छोटे-छोटे प्रसंगों पर मन में आत्महत्या या हत्या के परिणाम आते हों, मन में निरंतर अज्ञात भय, अवसाद, चंचलता रहती हो, मकान-दुकान में वास्तु दोष हो, भूतादि की बाधा हो तो यह आपके अष्टम भाव व अष्टमेश की प्रतिकूलता दर्शाता है। उपरोक्त दुःखों से मुक्ति श्री नवग्रह शांति चालीसा व नवग्रह शांति विधान के माध्यम से मिल सकती है।
  9. यदि मन में धर्म विद्रोह की भावना आती हो। धर्म कार्य के प्रति मन में भक्ति या लगन जागृति नहीं होती हो। पुरुषार्थ करते हुए भी भाग्य हमेशा प्रतिकूल हो जाता हो, अथक परिश्रम करते हुए भाग्योदय नहीं हो रहा हो (पदोन्नति के लाभ से वंचित हों)। प्रशासन व उच्चाधिकारी प्रगति में बाधक बनते हों, साथीगण ईर्ष्यावश व्यवधान खड़े करते हों तो यह नवमें भाग्य भवन व भाग्येश की अशुभता का परिचायक है। इसकी अशुभता श्री नवग्रह शांति चालीसा व नवग्रह शांति विधान के माध्यम से बदलकर अतिशुभ हो सकती है।
  10. यदि व्यापार व नौकरी में परिश्रम करके भी पर्याप्त सफलता नहीं मिले व्यापार में बार-बार घाटा लगता हो। अकस्मात् दुर्घटना से व्यापार में बार-बार हानि होती हो। आपने कार्य में मन नहीं लगता हो, जीवन में आलस्य प्रमाद अधिक प्रभावशाली हो। पिता से अच्छे संबंध नहीं हो। पिता बीमार या दुःखी रहते हों। दुकान-कारखाने-फैक्ट्री में वास्तु दोष हो। किसी ने व्यापार बांध दिया हो। राजनैतिक क्षेत्र व नेतृत्व में असफलता ही हाथ लगती हो। तो यह दशम कर्म भाव व कर्मेश की अशुभता दिखलाता है। इसकी अशुभता को आप श्री नवग्रह शांति चालीसा व श्री नवग्रह शांति विधान से शुभता में बदल सकते हैं।
  11. यदि आय स्रोत कम हो। लाभ कम हानि ज्यादा हो। छोटे भाई बहन हमेशा परेशान रहते हो या वो भी प्राणघातक शत्रुता रखते हो। घर दुकान में बार-बार चोरियाँ होती हों। इन्कमटैक्स, सेल्सटैक्स वालों के बार-बार छापे पड़ते हों। प्राकृतिक आपदाओं से व्यापार आदि में बार-बार हानि होती हो। तो जानिये आपका ग्यारहवाँ लाभ भाव व लाभेश, पीड़ित दूषित हो रहा है। श्री नवग्रह शांति चालीसा व श्री नवग्रह शांति विधान ही इसकी शांति का अचूक रामबाण उपाय हो सकता है।
  12. यदि मन में भौतिक विलासिता अधिक हो। परिवार के सदस्य स्वार्थी, फैशन परस्त व खर्चीले हो। हमेशा लाभ कम व खर्चा अधिक होता हो। अनेक दुर्घटनाओं के माध्यम से बार-बार मृत्यु का संकट खड़ा होता हो। तनाव, चिंता, अवसाद, शोक से जीवन त्रस्त हो गया हो। मन में आसक्ति और बाहर से विरक्ति के परिणाम हो तो यह बारहवें व्यय भाव और व्ययेश की अशुभता दर्शाते हैं। श्री नवग्रह शांति चालीसा और श्री नवग्रह शांति विधान सभी अशुभता को हटाकर कर सकते हैं भाग्य का उत्थान, बना सकते हैं जीवन को महान। कहीं आप बारह भावों की अशुभता से पीड़ित तो नहीं हैं? यदि हों तो पीड़ा घटाने के लिए और सुखों को बढ़ाने के लिए आप भी आज से ही शुरू करें श्री नवग्रह शांति चालीसा और प्रतिवर्ष करें श्री नवग्रह शांति विधान।

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