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Saturday, 2 August 2014

पुण्यार्ककृति: पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-17

पुण्यार्ककृति: पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-17: गतांश से आगे...अध्याय ग्यारह- वास्तुभूमिचयन (२) वर्ग विचार:-      अकारादिषु वर्गेषु दिक्षु पूर्वादितः क्रमात्।           गृध्रमार्...

Wednesday, 16 April 2014

उपाय

ऋषि पाराशर के उपाय --------1
पद्मा शर्मा
वृहत्त पाराशर होराशास्त्र में ऋषि पाराशर ने बहुत सारे उपाय बताए हैं जिनमें उन्होंने यह वर्णन किया है कि किस कारण से वह कष्ट आया है और उसकी निवृत्ति का क्या उपाय हैक् यह उपाय ज्यादातर मंत्र और दान पूजा-पाठ इत्यादि से संबंधित है। उन सब का संक्षिप्त विवरण इस लेख में दिया जा रहा है।
विभिन्न शाप :
संतान नष्ट होने या संतान ना होने को विभिन्न तरह के शाप के परिणाम ऋषि पाराशरजी ने बताया है। ऋषि पाराशर जी ने उल्लेेख किया है कि भगवान शंकर ने स्वयं पार्वती जी को यह उपाय बताए हैं।
1. सर्प का शाप :
बहुत सारे योगों से सर्प शाप का पता चलता है। उनमें राहु पर अधिक बल दिया गया है। कुल आठ योग बताए गए हैं। सर्प शाप से संतान नष्ट होने पर या संतान का अभाव होने पर स्वर्ण की एक नाग प्रतिमा बनाकर विधिपूर्वक पूजा की जाए जिसमें अनुष्ठान, दशंाश हवन, मार्जन, तर्पण, ब्राrाण भोजन कराके गोदान, भूमि दान, तिल दान, स्वर्ण दान इत्यादि किए जाएं तो नागराज प्रसन्न होकर कुल की वृद्धि करते हैं।
2. पितृ शाप :
गतजन्म में पिता के प्रति किए गए अपराध से जो शाप मिलता है तो संतान का अभाव होता है। इस दोष का पता सूर्य से संबंधित योगों से चलता है और सूर्य के पीç़डत होने या कुपित होने पर ये योग आधारित हैं। निश्चित है कि मंगल और राहु भी गणना में आएंगे। इसी को पितृ दोष या पितर शाप भी कहा गया है। कुल मिलाकर ग्यारह योग हैं।
उपाय : गया श्राद्ध करना चाहिए तथा जितने अधिक ब्राrाणों को भोजन करा सकें, कराएं। यदि कन्या हो तो गाय का दान और कन्या दान करना चाहिए। ऎसे करने से कुल की वृद्धि होगी।
3. मातृ शाप :
पंचमेश और चंद्रमा के संबंधों पर आधारित यह योग संतान का नष्ट होना या संतान का अभाव बताते हैं। इन योगों में निश्चित रूप से मंगल, शनि और राहु का योगदान मिलेगा। यह दोष कुल 13 मिलाकर हंै। इस जन्म में भी यदि कोई माता की अवहेलना करेगा या पीç़डत करेगा तो अगले जन्म में यह दोष देखने को मिलेगा।
4. भ्रातृ शाप :
यदि गतजन्म में भाई के प्रति कोई अपराध किया गया हो तो उसके शाप के कारण इस जन्म में संतान नष्ट होना या संतान का अभाव मिलता है। पंचम भाव, मंगल और राहु से यह दोष देखे जाते हैं। यह दोष कुल मिलाकर तेरह हैं।
उपाय : हरिवंश पुराण का श्रवण करें, चान्द्रायण व्रत करें, कावेरी नदी या अन्य पवित्र नदियों के किनारे शालिग्राम के सामने पीपल वृक्ष उगाएं तथा पूजन करें, पत्नी के हाथ से दस गायों का दान करें और फलदार वृक्षों सहित भूमि का दान करें तो निश्चित रूप से कुल वृद्धि होती है।
5. मामा का शाप :
गतजन्म में यदि मामा के प्रति कोई अपराध किया गया हो तो उसके शाप से संतान का अभाव इस जन्म में देखने को मिलता है। यदि ऎसा होता है कि पंचम भाव में बुध, गुरू, मंगल और राहु मिलते हैं और लग्न में शनि मिलते हैं। इस योग में शनि-बुध का विशेष योगदान होता है।
उपाय : भगवान विष्णु की मूर्ति की स्थापना, तालाब, बाव़डी, कुअंा और बांध को बनवाने से कुल की वृद्धि होती है।
6. ब्रrा शाप : गतजन्म में कोई धन या बल के मद में ब्राrाणों का अपमान करता है तो उसके शाप से इस जन्म में संतान का अभाव होता है या संतान नष्ट होती है। यह कुल मिलाकर सात योग हैं। नवम भाव, गुरू, राहु और पाप ग्रहों को लेकर यह योग देखने को मिलते हैं। योग का निर्णय तो विद्वान ज्योतिष्ाी ही करेंगे परंतु उपाय निम्न बताए गए हैं।
उपाय : चान्द्रायण व्रत, प्रायश्चित करके गोदान, दक्षिणा, स्वर्ण और पंचरत्न तथा अधिकतम ब्राrाणों को भोजन कराएं तो शाप से निवृत्ति होकर कुल की वृद्धि होती है।
7. पत्नी का शाप :
गतजन्म में पत्नी के द्वारा यदि शाप मिलता है तो इस जन्म में संतान का अभाव होता है। यह ग्यारह योग बताए गए हैं जो सप्तम भाव और उस पर पापग्रहों के प्रभाव से देखे जाते हैं।
उपाय : कन्या दान श्रेष्ठ उपाय बताया गया है। यदि कन्या नहीं हो तो स्वर्ण की लक्ष्मी-नारायण की मूर्ति तथा दस ऎसी गाय जो बछ़डे वाली माँ हों तथा शैया, आभूषण, वस्त्र इत्यादि ब्राrाण जो़डे को देने से पुत्र होता है और कुल वृद्धि होती है।
8. प्रेत शाप : यह नौ योग बताए गए हैं जिनमें ये वर्णन है कि अगर श्राद्ध का अधिकारी अपने मृत पितरों का श्राद्ध नहीं करता तो वह अगले जन्म में अपुत्र हो जाता है। इस दोष्ा की निवृत्ति के लिए निम्न उपाय हैं।
उपाय : गया में पिण्डदान, रूद्राभिषेक, ब्रrाा की स्वर्णमय मूर्ति, गाय, चांदी का पात्र तथा नीलमणि दान करना चाहिए।
9. ग्रह दोष्ा : यदि ग्रह दोष्ा से संतान हानि हो तो बुध और शुक्र के दोष में भगवान शंकर का पूजन, गुरू और चंद्र के दोष्ा में संतान गोपाल का पाठ, यंत्र और औषधि का सेवन, राहु के दोष से कन्या दान, सूर्य के दोष से भगवान विष्णु की आराधना, मंगल और शनि के दोष से षडङग्शतरूद्रीय जप कराने से संतान प्राçप्त होती है और कुल की वृद्धि होती है।

उपाय

ऋषि पाराशर के उपाय --------2
पद्मा शर्मा
अन्य दोषौं के उपाय :
अमावस्या का जन्म : ऋषि पाराशर जी का मानना है कि अमावस्या के जन्म से घर में दरिद्रता आती है अत: अमावस्या के दिन संतान का जन्म होने पर शांति अवश्य करानी चाहिए। इस उपाय के अंतर्गत विधिपूर्वक कलश स्थापना करके उसमें पंच पल्लव, ज़ड, छाल और पंचामृत डालकर अभिमंत्रित करके अग्निकोण में स्थापना कर दें फिर सूर्य की सोने की, चंद्रमा की चांदी की मूर्ति बनवाकर स्थापना करें और षोडशोपचार या पंचोपचार से पूजन करें फिर इन ग्रहों की समिधा से हवन करें, माता-पिता का भी अभिषेक करें और सोने, चांदी या गाय की दक्षिणा दें और इसके बाद ब्राrाण भोजन कराएं। इससे गर्त के ग्रह चंद्रमा एवं सूर्य की शांति होती है और जातक का कल्याण होता है।
कृष्ण चतुर्थी व्रत के उपाय : चतुर्थी को छ: भागों में बांटा है। प्रथम भाग में जन्म होने पर शुभ होता है, द्वितीय भाग में जन्म हो तो पिता का नाश, तृतीय भाग में जन्म हो तो माता की मृत्यु, चतुर्थ भाग में जन्म हो तो मामा का नाश, पंचम भाग में जन्म हो तो कुल का नाश, छठे भाग में जन्म हो तो धन का नाश या जन्म लेने वाले स्वयं का नाश होता है।
उपाय : इस दोष्ा का निवारण भगवान शिवजी की पूजा से होता है। यथाशक्ति शिव की स्वर्ण प्रतिमा बनाकर महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें। इस जप का विधान थो़डा सा तकनीकी और कठिन होता है। हवन में सभी ग्रहों की आहुतियां उनके निमित्त समिधा से दी जाती हैं, बाद में स्थापित कलश के जल से माता-पिता का अभिषेक कराया जाता है।
भद्रा इत्यादि में जन्म का दोष :
भद्रा, क्षय तिथि, व्यतिपात, परिघ, वज्र आदि योगों में जन्म तथा यमघंट इत्यादि में जो जातक जन्म लेता है, उसे अशुभ माना गया है।
उपाय : यह दुर्योग जिस दिन हुआ हो, वह दुर्योग जिस दिन आए उसी दिन इसकी शांति करानी आवश्यक है। इस दुर्योग के दिन विष्णु, शंकर इत्यादि की पूजा व अभिषेक शिवजी मंदिर में धूप, घी, दीपदान तथा पीपल वृक्ष की पूजा करके विष्णु भगवान के मंत्र का 108 बार हवन कराना चाहिए। पीपल को आयुर्दायक माना गया है। इसके पश्चात् ब्राrाण भोज कराएं तो व्यक्ति दोष मुक्त हो जाता है।
माता-पिता के नक्षत्र में जन्म :
यदि माता-पिता या सगे भाई-बहिन के नक्षत्र में किसी का भी जन्म हो तो उनमें से किसी को भी मरणतुल्य कष्ट अवश्य होगा।
उपाय : किसी शुभ लग्न में अग्निकोण से ईशान कोण की तरफ जन्म नक्षत्र की सुंदर प्रतिमा बनाकर कलश पर स्थापित करें फिर लाल वस्त्र से ढककर उपरोक्त नक्षत्रों के मंत्र से पूजा-अर्चना करें फिर उसी मंत्र से 108 बार घी और समिधा से आहुति दें तथा कलश के जल से पिता, पुत्र और सहोदर का अभिषेक करें। ब्राrाण भोजन कराएं और दक्षिणा दें इससे उस नक्षत्र की शांति होती है।
संक्रांति जन्म दोष
:
ग्रहों की संक्रांतियों के नाम घोरा, ध्वांक्षी, महोदरी, मन्दा, मन्दाकिनी, मिश्रा और राक्षसी इत्यादि हैं। सूर्य की संक्रांति में जन्म लेने वाला दरिद्र हो जाता है इसलिए शांति करानी आवश्यक है।
उपाय : संक्रांति में जन्म का अगर दोष्ा हो तो नवग्रह का यज्ञ करना चाहिए। विधि-विधान के साथ अधिदेव और प्रत्यधिदेव देवता के साथ जिस ग्रह की संक्रांति हो उसकी प्रतिमा को स्थापित कर लें फिर ग्रहों की पूजा करके व हवन करके महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। तिल से हवन कर लेने के बाद माता-पिता का अभिषेक करें और यथाशक्ति ब्राrाणों को भोजन कराके, दान-दक्षिणा दें इससे संक्रांति जन्म दोष दूर होता है।
ग्रहण काल में जन्म का दोष :
जिसका जन्म ग्रहणकाल में होता है उसे व्याधि, कष्ट, दरिद्रता और मृत्यु का भय होता है। ग्रहण नक्षत्र के स्वामी तथा सूर्यग्रहण में सूर्य की तथा चंद्रग्रहण में चंद्रमा की मूर्ति बनाएं। सूर्य की प्रतिमा सोने की, चंद्रमा की प्रतिमा चांदी तथा राहु की प्रतिमा सीसे की बनाएं। इन ग्रहों के प्रिय विषयों का दान करना चाहिए फिर ग्रह के लिए निमित्त समिधा से हवन करें परंतु नक्षत्र स्वामी के लिए पीपल की समिधा का इस्तेमाल करें। कलश के जल से जातक का अभिषेक करें और ब्राrाण को भोजन कराएं व दान-दक्षिणा दें। इससे ग्रहणकाल में जन्म दोष दूर होता है।
प्रसव विकार दोष्ा :
यदि निर्धारित समय से कुछ महीने पहले या कुछ महीने बाद प्रसव हो तो इस विकार से ग्राम या राष्ट्र का अनिष्ट होता है। अंगहीन या बिना मस्तिष्क का या अधिक मस्तिष्क वाला जातक जन्म ले या अन्य जानवरों की आकृति वाला जातक जन्म ले तो यह विकार गाँव के लिए आपत्ति लाने वाला होता है। कुल में भी पी़डा आती है। पाराशर ऎसे प्रसव के लिए अत्यंत कठोर है और ना केवल ऎसी स्त्री बल्कि ऎसे जानवर को भी त्याग देने के लिए कहते हैं। इसके अतिरिक्त 15वें या 16वें वर्ष का गर्भ प्रसव भी अशुभ माना गया है और विनाश कारक होता है। इस विकार की भी शांति का प्रस्ताव किया गया है।
उपाय : ब्रrाा, विष्णु और रूद्र का पूजन, ग्रह यज्ञ, हवन, अभिषेक और ब्राrाण भोजन कराना चाहिए। इस प्रकार से शांति कराने से अनिष्ट से रक्षा होती है।
त्रीतर जन्म विकार :
तीन पुत्र के बाद कन्या का जन्म हो या तीन कन्या के बाद पुत्र का जन्म हो तो पितृ कुल या मातृ कुल में अनिष्ट होता है।
उपाय : जन्म का अशौच बीतने के बाद किसी शुभ दिन किसी धान की ढेरी पर चार कलश की स्थापना करके ब्रrाा, विष्णु, शंकर और इंद्र की पूजा करनी चाहिए। रूद्र सूक्त और शांति सूक्त का पाठ करना चाहिए फिर हवन करना चाहिए। इससे अनिष्ट शांत होता है।
गण्डान्त विकार :
पूर्णातिथि (5,10,15) के अंत की ƒ़ाडी, नंदा तिथि (1,6,11) के आदि में दो ƒ़ाडी कुल मिलाकर चार तिथि को गण्डान्त कहा गया है। इसी प्रकार रेवती और अश्विनी की संधि पर, आश्लेषा और मघा की संधि पर और ज्येष्ठा और मूल की संधि पर चार ƒ़ाडी मिलाकर नक्षत्र गण्डान्त कहलाता है। इसी तरह से लग्न गण्डान्त होता है। मीन की आखिरी आधी घटी और मेष की प्रारंभिक आधी घटी, कर्क की आखिरी आधी घटी और सिंह की प्रारंभिक आधी घटी, वृश्चिक की आखिरी आधी घटी तथा धनु की प्रारंभिक आधी घटी लग्न गण्डान्त कहलाती है। इन गण्डान्तों में ज्येष्ठा के अंत में पांच घटी और मूल के आरंभ में आठ घटी महाअशुभ माना गया है।
उपाय : गण्डान्त शांति के बाद ही पिता बालक का मुंह देखें। तिथि गण्डान्त में बैल का दान, नक्षत्र गण्डान्त में बछ़डे वाली गाय का दान और लग्न गण्डान्त में सोने का दान करना चाहिए। गण्डान्त के पूर्व भाग में जन्म हो तो पिता के साथ बच्चो का अभिषेक करना चाहिए और यदि दूसरे भाग में जन्म हो तो माता के साथ बालक का अभिषेक करना चाहिए। इन उपायों के अंतर्गत तिथि स्वामी, नक्षत्र स्वामी या लग्न स्वामी का स्वरूप बनाकर, कलश पर पूजा करें और फिर हवन करें व अभिषेक इत्यादि करें।
लगभग सभी गण्डान्तों में गोदान को एक बहुत सशक्त उपाय माना गया है। ज्येष्ठा गण्ड शांति में इन्द्र सूक्त और महामृत्युंजय का पाठ किया जाता है। मूल, ज्येष्ठा, आश्लेषा और मघा को अति कठिन मानते हुए तीन गायों का दान बताया गया है। रेवती और अश्विनी में दो गायों का दान और अन्य गण्ड नक्षत्रों के दोष या किसी अन्य दुष्ट दोष में एक गाय का दान बताया गया है।
ज्येष्ठा नक्षत्र की कन्या अपने पति के ब़डे भाई का विनाश करती है और विशाखा के चौथे चरण में उत्पन्न कन्या अपने देवर का नाश करती है। अत: इनके विवाह के समय तो अवश्य ही गोदान कराना चाहिए। आश्लेेषा के अंतिम तीन चरणों में जन्म लेने वाली कन्या या पुत्र अपनी सास के लिए अनिष्टकारक होते हैं तथा मूल के प्रथम तीन चरणों में जन्म लेने वाले जातक अपने ससुर को नष्ट करने वाले होते हैं अत: इनकी शांति अवश्य करानी चाहिए। अगर पति से ब़डा भाई ना हो तो यह दोष्ा नहीं लगता है।
पाराशर अतिरिक्त लगभग सभी होरा ग्रंथ शास्त्रकारों ने ग्रहों की शाति को विशेष महत्व दिया है। फलदीपिका के रचनाकार मंत्रेश्वर जी ने एक स्थान पर लिखा है कि - "दशापहाराष्टक वर्गगोचरे, ग्रहेषु नृणां विषमस्थितेष्वपि। जपेच्चा तत्प्रीतिकरै: सुकर्मभि:, करोति शान्तिं व्रतदानवन्दनै:।।" जब कोई ग्रह अशुभ गोचर करे या अनिष्ट ग्रह की महादशा या अन्तर्दशा हो तो उस ग्रह को प्रसन्न करने के लिए व्रत, दान, वन्दना, जप, शांति आदि द्वारा उसके अशुभ फल का निवारण करना चाहिए।
ऋषि पाराशर द्वारा बताई गई जप संख्या : ऋषि पाराशर जी ने सूर्य की जप संख्या सात हजार, चंद्रमा की ग्यारह हजार, मंगल की दस हजार, बुध की नौ हजार, गुरू की उन्नीस हजार, शुक्र की सोलह हजार, शनि की तेईस हजार, राहु की अठारह हजार और केतु की सत्रह हजार बताई है। पाराशर जी को वृक्ष आयुर्वेद का प्रथम लेखक भी माना जाता है और उन्होंने वृक्षों की औषधि महत्ता बताते हुए बहुत सारी वनस्पतियों पर लिखा है परंतु उनको ज्योति

जड़ों से ठीक करें ग्रहों की चाल

जड़ों से ठीक करें ग्रहों की चाल
रत्नों की प्रामाणिकता और शुद्धता को लेकर सन्देह हर समय बना रहता है,और प्रत्येक व्यक्ति के लिये शुद्ध रत्न खरीद पाना भी असम्भव होता है,क्योंकि रत्नों के मूल्य बहुत ज्यादा होते हैं. ज्योतिष का एक क्षेत्र एेसा भी है जहाँ प्रत्येक वर्ग व्यक्ति के लिये समाधान है,वह है वनस्पति और जड़ों को धारण कर के अपने ग्रहयोगों को सुधारना. यह बहुत सस्ता,प्रभावशाली और सहज उपाय है जिसमें ग्रहों के अनुसार जड़ों और वनस्पतियों को विभक्त किया गया है. Þशारदा तिलकÞ और अन्य कई मध्य युगीन ग्रंथों में इस उपाय का उल्लेख मिलता है. एक निश्चित प्रक्रिया के अनुसार यदि अपनी राशि,नक्षत्र और कुंडली में ग्रहों की स्थिति के अनुरूप जड़ों को धारण किया जाये तो विस्मयकारी तरीके से लाभ होता है आपकी कुंडली में जो ग्रह आपके लिये हितकारी और प्रगतिकारक हैं उनका किसी अच्छे ज्योतिष से निर्धारण करा कर उस के अनुरूप जड़ को शुद्ध कर के,उस ग्रह से सम्बंधित दिन मंत्रों का जाप कर के धारण करें और प्रतिदिन जाप करते रहें तो निश्चित लाभ होता है.
सूर्य
यदि आपकी कुंडली में सूर्य नीच का होकर तुला राशि में है और केंद्र में या लग्नस्थ है तो कृत्तिका नक्षत्र वाले दिन बेल का एक जड़ प्रात:काल तोडक़र,शिवालय में शिवजी को समर्पित करें और ऊँ भास्कराय ह्रीं मंत्र का जाप करने के पश्चात गुलाबी धागे से धारण करें. प्रतिदिन इस मंत्र का जाप करते रहें. रोग,संतानहीनता जैसी अन्य कई समस्याओं का समाधान होगा.
चंद्र
यदि आप की कुंडली में चंद्र नीच का होकर वृश्चिक राशि में है,या राहु,केतु और शनि द्वारा प्रभावित है तो, रोहिणी नक्षत्र वाले दिन खिरनी की जड़, शुद्ध करके शिवजी को समर्पित करें और ऊँ श्रां श्रीं श्रौं स:चंद्रमसे नम: मंत्र का जाप कर के सफेद धागे में धारण करें. फेफड़े सम्बंधित रोग,एकाकीपन और भावनात्मक समस्याओं का समाधान होगा.
मंगल
आपकी कुंडली में मंगल नीच का होकर कर्क राशि में हो या आप मांगलिक हों तो मृगशिरा नक्षत्र वाले दिन अनंतमूल की जड़ शुद्धिकरण के पश्चात हनुमान जी की पूजा कर के ऊँ अं अंगारकाय नम: मंत्र का जाप कर के नारंगी धागे से धारण करें. क्रोध, अवसाद और वैवाहिक बाधा से मुक्ति मिलेगी
बुध
यदि आपकी कुंडली में बुध द्वादश,अष्टम भाव में या नीच का होकर मीन राशि में है, तो आप आश£ेषा नक्षत्र वाले दिन विधारा की जड़ गणेश भगवान को को समर्पित करने के पश्चात ऊँ बुं बुधाय नम: मंत्र का जाप कर के हरे रंग के धागे में धारण करें. इस से बुद्धि विकसित होगी तथ निर्णय लेने में हो रही त्रुटि का भी समाधान होगा.
गुरु
आपकी कुंडली में यदि गुरु रहु द्वरा युक्त है,राहु द्वारा ²ष्ट है या नीच का होकर मकर राशि में है,तो शुद्ध और ताजी हल्दी की गाँठ पीले धागे में, पुनवर्सु नक्षत्र वाले दिन कृष्ण भगवान या बृहस्पति देव जी की पूजा कर के ऊँ बृं बृहस्पतये नम: मंत्र का जप करके धारण करें. व्यवसाय,नौकरी,विवाह सम्बन्धी समस्या और लीवर सम्बन्धी रोगों में लाभ होगा.
शुक्र
यदि आपकी कुंडली में शुक्र अष्टम भाव में है या नीच का होकर कन्या राशि में है, तो आप सरपोंखा की जड़, भरणी नक्षत्र वाले दिन सफेद धागे से सायंकाल के समय लक्ष्मी जी का पूजन कर ऊँ शुं शुक्राय नम: मंत्र का जाप कर के धारण करें. संतानहीनता, कर्ज की अधिकता और धन के अभाव जैसी समस्या से मुक्ति मिलेगी.
शनि
आपकी कुंडली में यदि शनि सूर्य युक्त है,सप्तम भाव में है या नीच का होकर मेष राशि में है तो आप अनुराधा नक्षत्र वाले दिन बिच्छू या बिच्छौल की घांस को नीले धागे से काली जी की पूजा के पश्चात ऊँ शं शनैश्चराय नम: मंत्र का जाप कर के धारण करें. कार्यों में हो रहे विलम्ब,कानूनी अड़चन और रोगों से मुक्ति मिलेगी.
राहु
आपकी कुंडली में राहु लग्न,सप्तम या भाग्य स्थान मे है, तथा शुभ ग्रहों से युक्त है तो आप आद्र्रा नक्षत्र वाले दिन चन्दन की लकड़ी का टुकड़ा शिव जी का अभिषेक कर के भूरे धागे में ऊँ रां राहुए नम: मंत्र का जाप कर के धारण करें. रोग, चिड़चिड़ापन, क्रोध, बुरी आदतों तथा अस्थिरता से मुक्ति मिलेगी.
केतु
यदि आपकी कुंडली में केतु,चन्द्र या मंगल युक्त होकर लग्नस्थ है, तो आप अश्विनी नक्षत्र वाले दिन गणेश जी का पूजन करने के पश्चात शुद्ध की हुई असगन्ध या अश्वगन्धा की जड़, ऊँ कें केतवे नम: मंत्र का जाप करने के पश्चात, नारंगी धागे से धारण करें. चर्म सम्बन्धी रोग,किडनी रोगों और वैवाहिक समस्याओं में लाभ होगा.
याद रखें कि समस्या की पूर्ण मुक्ति के लिये, आपको मंत्रों का जाप प्रतिदिन करना होगा.
ग्रह और उनसे सम्बन्धित दान सामग्री
यदि आपको कोई ग्रह परेशान कर रहा है,तो सम्बन्धित जड़ को धारण करने के पश्चात उस से सम्बन्धित वस्तुओं का गरीब और असहाय लोगों को दान करने से भी लाभ होता है:
सूर्य : माणिक्य, लाल वस्त्र, लाल पुष्प, लाल चंदन, गुड़, केसर अथवा तांबा.
चंद्र : बांस की टोकरी, चावल, श्वेत वस्त्र, श्वेत पुष्प, घी से भरा पात्र, चांदी, मिश्री, दूध, दही.
मंगल : मूंगा, गेहूं, मसूर, लाल वस्त्र, कनेर पुष्प, गुड़, तांबा, लाल चंदन, केसर.
बुध : हरे मूंग, हरा वस्त्र, हरा फल, पन्ना, केसर, कस्तूरी, कपूर, घी, मिश्री, धार्मिक पुस्तकें.
गुरू : घी, शहद, हल्दी, पीत वस्त्र, शास्त्र पुस्तक, पुखराज, लवण, कन्याओं को भोजन.
शुक्र : सफेद वस्त्र, श्वेत स्फटिक, चावल, सुगंधित वस्तु, कपूर, अथवा पुष्प, घी- शक्कर- मिश्री-दही.
शनि : तिल, सभी तेल, लोहा धातु, छतरी, काली गाय, काला कपड़ा, नीलम, जूता,कंबल.
राहु : गेहूं, उड़द, काला घोड़ा, खडग़, कंबल, तिल, लौह, सप्त धान्य, अभ्रक.
केतु : तिल, कंबल, काला वस्त्र तथा पुष्प, सभी तेल, उड़द, काली मिर्च, सप्तधान्य.

ग्रह शांति


 ग्रह शांति
 रूचि थापर
आजकल लोग अनुभव सिद्ध एवं व्यवहारिक उपाय चाहते हैं ताकि आम व्यक्ति, जन सामान्य एवं पीड़ित व्यक्ति लाभ उठा सके। ग्रहों की शांति के लिए सरल एवं अचूक उपाय प्रस्तुत हैं- जिसमें लाल किताब व ऋषि पाराशर प्रणीत ज्योतिष शास्त्र के उपाय सम्मिलित हैं।
ससार में प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी ग्रह से पीड़ित है। हर व्यक्ति धन-धान्य संपन्न भी नहीं है। ग्रह-पीड़ा के निवारण के लिए निर्धन एवं मध्यम वर्ग का व्यक्ति दुविधा में पड़ जाता है।
यह वर्ग न तो लंबे-चौड़े यज्ञ, हवन या अनुष्ठान करवा सकता है, न ही हीरा, पन्ना, पुखराज जैसे महंगे रत्न धारण कर सकता है। ज्योतिष विद्या देव विद्या है।
यदि ज्योतिषियों के पास जाएं तो वे प्रायः पुरातन ग्रंथों में से लिए गए उपाय एवं रत्न धारण करने की सलाह दे देते हैं। परंतु आजकल लोग अनुभव सिद्ध एवं व्यवहारिक उपाय चाहते हैं ताकि आम व्यक्ति, जन सामान्य एवं पीड़ित व्यक्ति लाभ उठा सकें।
ग्रहों की शांति के लिए सरल एवं अचूक उपाय प्रस्तुत हैं- जिसमें लाल किताब के अनुसार व ऋषि पाराशर प्रणीत ज्योतिष शास्त्र के अनुसार उपाय बताए गए हैं।
पाराशर एस्ट्रोलॉजी के अनुसार
: 1. सूर्य ग्रहों का राजा है। इसलिए देवाधिदेव भगवान् विष्णु की अराधना से सूर्य देव प्रसन्न होते हैं। सूर्य को जल देना, गायत्री मंत्र का जप करना, रविवार का व्रत करना तथा रविवार को केवल मीठा भोजन करने से सूर्य देव प्रसन्न होते हैं। सूर्य का रत्न 'माणिक्य' धारण करना चाहिए परंतु यदि क्षमता न हो तो तांबे की अंगूठी में सूर्य देव का चिह्न बनवाकर दाहिने हाथ की अनामिका में धारण करें (रविवार के दिन) तथा साथ ही सूर्य के मंत्र का 108 बार जप करें। मंत्र : ऊँ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः
2. ग्रहों में चंद्रमा को स्त्री स्वरूप माना है। भगवान शिव ने चंद्रमा को मस्तक पर धारण किया है। चंद्रमा के देवता भगवान शिव हैं। सोमवार के दिन शिवलिंग पर जल चढ़ाएं व शिव चालीसा का पाठ करें। 16 सोमवार का व्रत करें तो चंद्रमा ग्रह द्वारा प्रदत्त कष्ट दूर होते हैं। रत्नों में मोती चांदी की अंगूठी में धारण कर सकते हैं। चंद्रमा के दान में दूध, चीनी, चावल, सफेद पुष्प, दही (सफेद वस्तुओं) का दान दिया जाता है तथा मंत्र जप भी कर सकते हैं। मंत्र : ऊँ सों सोमाय नमः
3. जन्मकुंडली में मंगल यदि अशुभ हो तो मंगलवार का व्रत करें, हनुमान चालीसा, सुंदरकांड का पाठ करें। मूंगा रत्न धारण करें या तांबे की अंगूठी बनवाकर उसमें हनुमान जी का चित्र अंकितकर मंगलवार को धारण कर सकते हैं। स्त्रियों को हनुमान जी की पूजा करना वर्जित बताया गया है। मंगल के दान में गुड़, तांबा, लाल चंदन, लाल फूल, फल एवं लाल वस्त्र का दान दें। मंत्र : ऊँ अं अंगारकाय नमः
4. ग्रहों में बुध युवराज है। बुध यदि अशुभ स्थिति में हो तो हरा वस्त्र न पहनें तथा भूलकर भी तोता न पालें। अन्यथा स्वास्थ्य खराब रह सकता है। बुध संबंधी दान में हरी मूंग, हरे फल, हरी सब्जी, हरा कपड़ा दान-दक्षिणा सहित दें व बीज मंत्र का जप करें। मंत्र : ऊँ बुं बुधाय नमः
5. गुरु : गुरु का अर्थ ही महान है- सर्वाधिक अनुशासन, ईमानदार एवं कर्त्तव्यनिष्ठ। गुरु तो देव गुरु हैं। जिस जातक का गुरु निर्बल, वक्री, अस्त या पापी ग्रहों के साथ हो तो वह ब्रह्माजी की पूजा करें। केले के वृक्ष की पूजा एवं पीपल की पूजा करें। पीली वस्तुओं (बूंदी के लडडू, पीले वस्त्र, हल्दी, चने की दाल, पीले फल) आदि का दान दें। रत्नों में पुखराज सोने की अंगूठी में धारण कर सकते हैं व बृहस्पति के मंत्र का जप करते रहें। मंत्र : ऊँ बृं बृहस्पतये नमः
6. शुक्र असुरों का गुरु, भोग-विलास, गृहस्थ एवं सुख का स्वामी है। शुक्र स्त्री जातक है तथा जन समाज का प्रतिनिधित्व करता है। जिन जातकों का शुक्र पीड़ित करता हो, उन्हें गाय को चारा, ज्वार खिलाना चाहिए एवं समाज सेवा करनी चाहिए। रत्नों में हीरा धारण करना चाहिए या बीज मंत्र का जप करें। मंत्र : ऊँ शुं शुक्राय नमः
7. सूर्य पुत्र शनि, ग्रहों में न्यायाधीश है तथा न्याय सदैव कठोर ही होता है जिससे लोग शनि से भयभीत रहते हैं। शनि चाहे तो राजा को रंक तथा रंक को राजा बना देता है। शनि पीड़ा निवृत्ति हेतु महामृत्युंजय का जप, शिव आराधना करनी चाहिए। शनि के क्रोध से बचने के लिए काले उड़द, काले तिल, तेल एवं काले वस्त्र का दान दें। शनि के रत्न (नीलम) को धारण कर सकते हैं। मंत्र : ऊँ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः
8. राहु की राक्षसी प्रवृत्ति है। इसे ड्रेगन्स हैड भी कहते हैं। राहु के दान में कंबल, लोहा, काले फूल, नारियल, कोयला एवं खोटे सिक्के आते हैं। नारियल को बहते जल में बहा देने से राहु शांत हो जाता है। राहु की महादशा या अंतर्दशा में राहु के मंत्र का जप करते रहें। गोमेद रत्न धारण करें। मंत्र : ऊँ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः।
9. केतु राक्षसी मनोवृत्ति वाले राहु का निम्न भाग है। राहु शनि के साथ समानता रखता है एवं केतु मंगल के साथ। इसके आराध्य देव गणपति जी हैं। केतु के उपाय के लिए काले कुत्ते को शनिवार के दिन खाना खिलाना चाहिए। किसी मंदिर या धार्मिक स्थान में कंबल दान दें। रत्नों में लहसुनिया धारण करें। मंत्र : ऊँ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं सः केतवे नमः