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Thursday, 4 August 2011

पाशुपत-शान्ति

पाशुपत-शान्ति
वक्ष्ये पाशुपतास्त्रेण, शान्ति-जापादि पूर्वतः। पादतः पूर्व-नाशो हि, फडन्तं चापदादि-नुत्।।
ॐ नमो भगवते महा-पाशुपताय अतुल-बल-वीर्य-पराक्रमाय त्रि-पञ्च-नयनाय नाना-प्रहरणोद्यताय सर्वांग-रक्ताय भिन्नाञ्जन-चय-प्रख्याय श्मशान-वेताल-प्रियाय सर्व-विघ्न-निकृन्तनाय सर्व-सिद्धि प्रदाय भक्तानुकम्पिने असंख्य-वक्त्र-भुज-पादाय तस्मिन् सिद्धाय वेताल-चित्रासने शाकिनी-क्षोभ-जनकाय व्याधि-निग्रह-कारिणे पाप-भञ्जनाय सूर्य-सोमाग्नि-नेत्राय विष्णु-कवचाय शंख-वज्र-हस्ताय यम-सण्ड-वरुण-पाशाय रुद्र-शूलाय ज्वलज्जिह्वाय सर्व-रोग-विद्रावणाय ग्रह-निग्रह-कारिणे दुष्ट-नाग-क्षय-कारिणे ॐ कृष्ण-पिंगलाय फट्।
हूंकारास्त्राय फट्। वज्र-हस्ताय फट्। शक्तये फट्। दण्डाय फट्। यमाय फट्। खंगाय फट्। नैऋत्याय फट्। वरुणाय फट्। पाशाय फट्। ध्वजाय फट्। अंकुशाय फट्। गदायै फट्। कुबेराय फट्। त्रिशूलाय फट्। मुद्गराय फट्। चक्राय फट्। पद्माय फट्। नागास्त्राय फट्। ईशानाय फट्। खेटकास्त्राय फट्। मुण्डास्त्राय फट्। कंकालास्त्राय फट्। पिच्छिकास्त्राय फट्। क्षुरिकास्त्राय फट्। ब्रह्मास्त्राय फट्। शक्त्यस्त्राय फट्। गणास्त्राय फट्। पिलिपिच्छास्त्राय फट्। गन्धर्वास्त्राय फट्। मूर्वास्त्राय फट्। दक्षिणास्त्राय फट्। वामास्त्राय फट्। पश्चिमास्त्राय फट्। मन्त्रास्त्राय फट्। शाकिन्यस्त्राय फट्। योगिन्यस्त्राय फट्। दण्डास्त्राय फट्। महा-दण्डास्त्राय फट्। नागास्त्राय फट्। शिवास्त्राय फट्। ईशानास्त्राय फट्। पुरुषास्त्राय फट्। अघोरास्त्राय फट्। सद्योजातास्त्राय फट्। हृदयास्त्राय फट्। महाऽस्त्राय फट्। गरुड़ास्त्राय फट्। राक्षसास्त्राय फट्। दानवास्त्राय फट्। क्षौं नर-सिंहास्त्राय फट्। त्वष्ट्रास्त्राय फट्। सर्वास्त्राय फट्।
नः फट्। वः फट्। पः फट्। फः फट्। मः फट्। श्रीः फट्। फेः फट्। भूः फट्। भुवः फट्। स्वः फट्। महः फट्। जनः फट्। तपः फट्। सर्व-लोक फट्। सर्व-पाताल फट्। सर्व-तत्त्व फट्। सर्व-प्राण फट्। सर्व-नाड़ी फट्। सर्व-कारण फट्। सर्व-देव फट्। ह्रीं फट्। श्रीं फट्। हूं फट्। श्रुं फट्। स्वां फट्। लां फट्। वैराग्याय फट्। मायाऽस्त्राय फट्। कामास्त्राय फट्। क्षेत्र-पालास्त्राय फट्। हूंकारास्त्राय फट्। भास्करास्त्राय फट्। चन्द्रास्त्राय फट्। विघ्नेश्वरास्त्राय फट्। ख्रों ख्रीं फट्। ह्रौं ह्रीं फट्। भ्रामय भ्रामय फट्। छादय छादय फट्। उन्मूलय उन्मूलय फट्। त्रासय त्रासय फट्। सञ्जीवय सञ्जीवय फट्। विद्रावय विद्रावय फट्। सर्व-दुरितं नाशय नाशय फट्।
सकृदावर्त्तना देव! सर्व-विघ्नान् विनाशयेत्।
शतावर्त्तेन चोत्पातान्, रणादौ विजयी भवेत्।।
घृत-गुग्गुल-होमाच्च, असाध्यानपि साधयेत्।
पठनात् सर्व-शान्तिः स्यात्, शस्त्रस्य पाशुपतस्य च।।
उक्त ‘पाशुपत-अस्त्र’ का एक बार पाठ करने से सभी विघ्न शान्त हो जाते हैं। सौ बार पाठ करने से उत्पात नष्ट होते हैं और विजय मिलती है। घृत-गुग्गुल से होम करे, तो असाध्य कार्य भी सम्भव हो जाते हैं। सामान्य पाठ करने से सब प्रकार की शान्ति होती है।

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