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Wednesday, 22 June 2011

ऋण मुक्ति के उपाय

ऋण मुक्ति के उपाय
1॰ चर लग्न मेष, कर्क, तुला व मकर में कर्ज लेने पर शीघ्र उतर जाता है। लेकिन, चर लग्न में कर्जा दें नहीं। चर लग्न में पांचवें व नवें स्थान में शुभ ग्रह व आठवें स्थान में कोई भी ग्रह नहीं हो, वरना ऋण पर ऋण चढ़ता चला जाएगा।
2॰ किसी भी महीने की कृष्णपक्ष की 1 तिथि, शुक्लपक्ष की 2, 3, 4, 6, 7, 8, 10, 11, 12, 13 पूर्णिमा व मंगलवार के दिन उधार दें और बुधवार को कर्ज लें।
3॰ हस्त नक्षत्र रविवार की संक्रांति के वृद्धि योग में कर्जा उतारने से मुक्ति मिलती है।
4॰ कर्ज मुक्ति के लिए ऋणमोचन मंगल स्तोत्र का पाठ करें एवं लिए हुए कर्ज की प्रथम किश्त मंगलवार से देना शुरू करें। इससे कर्ज शीघ्र उतर जाता है।
5॰ कर्ज लेने जाते समय घर से निकलते वक्त जो स्वर चल रहा हो, उस समय वही पांव बाहर निकालें तो कार्य सिद्धि होती है, परंतु कर्ज देते समय सूर्य स्वर को शुभकारी माना है।
6॰ लाल मसूर की दाल का दान दें।
7॰ वास्तु अनुसार ईशान कोण को स्वच्छ व साफ रखें।
8॰ वास्तुदोष नाशक हरे रंग के गणपति मुख्य द्वार पर आगे-पीछे लगाएं।
9॰ हनुमानजी के चरणों में मंगलवार व शनिवार के दिन तेल-सिंदूर चढ़ाएं और माथे पर सिंदूर का तिलक लगाएं। हनुमान चालीसा या बजरंगबाण का पाठ करें।
10॰ ऋणहर्ता गणेश स्तोत्र का शुक्लपक्ष के बुधवार से नित्य पाठ करें।
11॰ बुधवार को सवा पाव मूंग उबालकर घी-शक्कर मिलाकर गाय को खिलाने से शीघ्र कर्ज से मुक्ति मिलती है
12॰ सरसों का तेल मिट्टी के दीये में भरकर, फिर मिट्टी के दीये का ढक्कन लगाकर किसी नदी या तालाब के किनारे शनिवार के दिन सूर्यास्त के समय जमीन में गाड़ देने से कर्ज मुक्त हो सकते हैं।
13॰ सिद्ध-कुंजिका-स्तोत्र का नित्य एकादश पाठ करें।
14॰ घर की चौखट पर अभिमंत्रित काले घोड़े की नाल शनिवार के दिन लगाएं।
15॰ श्मशान के कुएं का जल लाकर किसी पीपल के वृक्ष पर चढ़ाना चाहिए। यह कार्य नियमित रुप से ७ शनिवार को किया जाना चाहिए।
16॰ ५ गुलाब के फूल, १ चाँदी का पत्ता, थोडे से चावल, गुड़ लें। किसी सफेद कपड़े में २१ बार गायत्री मन्त्र का जप करते हुए बांध कर जल में प्रवाहित कर दें। ऐसा ७ सोमवार को करें।
17॰ ताम्रपत्र पर कर्जनाशक मंगल यंत्र (भौम यंत्र) अभिमंत्रित करके पूजा करें या सवा चार रत्ती का मूंगायुक्त कर्ज मुक्ति मंगल यंत्र अभिमंत्रित करके गले में धारण करें।

18॰ सर्व-सिद्धि-बीसा-यंत्र धारण करने से सफलता मिलती है।

19॰ कुश की जड़, बिल्व का पञ्चांग (पत्र, फल, बीज, लकड़ी और जड़) तथा सिन्दूर- इन सबका चूर्ण बनाकर चन्दन की पीठिका पर नीचे लिखे मन्त्र को लिखे। तदन्तर पञ्चिपचार से पूजन करके गो-घृत के द्वारा ४४ दिनिं तक प्रतिदिन ७ बार हवन करे। मन्त्र की जप संख्या कम-से-कम १०,००० है, जो ४४ दिनों में पूरी होनी चाहिये। ४३ दिनों तक प्रतिदिन २२८ मन्त्रों का जाप हो और ४४ वें दिन १९६ मन्त्रों का। तदन्तर १००० मन्त्र का जप दशांश के रुप में करना आवश्यक है। मन्त्र इस प्रकार है-
“ॐ आं ह्रीं क्रौं श्रीं श्रियै नमः ममालक्ष्मीं नाशय नाशय मामृणोत्तीर्णं कुरु कुरु सम्पदं वर्धय वर्धय स्वाहा।”
20॰ ऋण मुक्ति के लिये निम्न मंत्रों में से किसी एक का जाप नित्य प्रति करें-
(क) “ॐ गणेश! ऋण छिन्धि वरेण्यं हुं नमः फट्।”
(ख) “ॐ मंगलमूर्तये नमः।”
(ग) “ॐ गं ऋणहर्तायै नमः।”
(घ) “ॐ अत्रेरात्मप्रदानेन यो मुक्तो भगवान् ऋणात् दत्तात्रेयं तमीशानं नमामि ऋणमुक्तये।

21॰ मंगलवार को शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग पर मसूर की दाल “ॐ ऋण-मुक्तेश्वर महादेवाय नमः” मंत्र बोलते हुए चढ़ाएं।
22॰ भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र के सम्मुख ७ बार, २१ बार या अधिक-से-अधिक ऋग्वेद के इस प्रसिद्ध मन्त्र का जप करें-
“ॐ भूरिदा भूरि देहिनो, मादभ्रं भूर्या भर।
भूरि धेदिन्द्र दित्ससि।
ॐ भूरि दाह्यसि श्रुतः पुरुजा शूर वृत्रहन्।
आ नो भजस्व राधसि।

(हे लक्ष्मीपते! आप दानी हैं, साधारण दानदाता ही नहीं बहुत बड़े दानी हैं। आप्तजनों से सुना है कि संसारभर से निराश होकर जो याचक आपसे प्रार्थना करता है उसकी पुकार सुनकर उसे आप आर्थिक कष्टों से मुक्त कर देते हैं-उसकी झोली भर देते हैं। हे भगवान्! मुझे इस अर्थ संकट से मुक्त कर दो।)
23॰ नीचे प्रदर्शित यन्त्र को किसी मंगलवार के दिन शुभमुहूर्त में, भोजपत्र के ऊपर, अनार की कलम से अष्टगंध के द्वारा लिखें। इसे प्रतिष्ठित कर निम्न मन्त्र की एक माला जप करें-“ॐ नमः भौमाय” फिर यन्त्र को ताबीज में भरकर धारण करें।
24॰ “गजेन्द्र-मोक्ष-स्तोत्र” का नित्य एक पाठ करना चाहिए। इसे अधिक प्रभावशाली बनाने के लिये यदि गजेन्द्र-मोक्ष-स्तोत्र के उपरान्त “नारायण-कवच” का पाठ किया जाये तो अधिक श्रेयष्कर होगा।
25. ऋण-परिहारक प्रदोष-व्रत
‘प्रदोष व्रत’ के दिन अर्थात् कृष्ण-पक्ष एवं शुक्ल-पक्ष की त्रयोदशी (तेरस) तिथि को प्रातःकाल स्नानादि कर भगवान् शंकर का यथा-शक्ति पञ्चोपचार या षोडशोपचार से पूजन करें। फिर निम्नलिखित ‘विनियोग’ आदि कर निर्दिष्ट मन्त्र का यथाशक्ति २१, ११, १ माला या केवल ११ बार जप करे।
विनियोगः- ॐ अस्य अनृणा-मन्त्रस्य श्रीऋण-मुक्तेश्वरः ऋषिः। त्रिष्टुप् छन्दः। रुद्रो देवता। मम ऋण-परिहारार्थे जपे विनियोगः।
ऋष्यादि-न्यासः- श्रीऋण-मुक्तेश्वरः ऋषये नमः शिरसि। त्रिष्टुप् छन्दसे नमः मुखे। रुद्र-देवतायै नमः हृदि। मम ऋण-परिहारार्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे।
कर-न्यासः- ॐ अनृणा अस्मिन् अंगुष्ठाभ्यां नमः। अनृणाः परस्मिन् तर्जनीभ्यां नमः। तृतीये लोके अनृणा स्याम मध्यमाभ्यां नमः। ये देव-याना अनामिकाभ्यां नमः। उत पितृ-याणा कनिष्ठिकाभ्यां नमः। सर्वाण्यथो अनृणाऽऽक्षीयेम करतल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः।
अङग-न्यासः- ॐ अनृणा अस्मिन् हृदयाय नमः। अनृणाः परस्मिन् शिरसे स्वाहा। तृतीये लोके अनृणा स्याम शिखायै वषट्। ये देव-याना कवचाय हुम्। उत पितृ-याणा नेत्र-त्रयाय वौषट्। सर्वाण्यथो अनृणाऽऽक्षीयेम अस्त्राय फट्।
ध्यानः-
ध्याये नित्यं महेशं रजत-गिरि-निभं चारु-चन्द्रावतंसम्,
रत्नाकल्पोज्ज्वलांगं परशु-मृग-वराभीति-हस्तं प्रसन्नम्।
पद्मासीनं समन्तात् स्तुतममर-गणैर्व्याघ्र-कृत्तिं वसानम्,
विश्वाद्यं विश्व-बीजं निखिल-भय-हरं पञ्च-वक्त्रं त्रिनेत्रम्।।
अर्थात् भगवान् रुद्र पञ्च-मुख और त्रिनेत्र हैं। चाँदी के पर्वत के समान उनकी उज्ज्वल कान्ति है। सुन्दर चन्द्रमा उनके मस्तक पर शोभायमान है। रत्न-जटित आभूषणों से उनका शरीर प्रकाशमान है। अपने चार हाथओं में परशु, मृग, वर और अभय मुद्राएँ धारण किए हैं। मुख पर प्रसन्नता है। पद्मासन पर विराजमान हैं। चारों ओर से देव-गण उनकी वन्दना कर रहे हैं। बाघ की खाल वे पहने हैं। विश्व के आदि, जगत् के मूल-स्वरुप और समस्त प्रकार के भय-नाशक-ऐसे महेश्वर का मैं नित्य ध्यान करता हूँ।
उक्त प्रकार ध्यान कर भगवान् रुद्र का पुनः पञ्चोपचारों से या मानस उपचारों से पूजन कर हाथ जोड़कर निम्न प्रार्थना करे-
अनन्त-लक्ष्मीर्मम सन्निधौ सदा स्थिरा भवत्वित्यसि-
वर्धनेन नानाऽऽदृतः शत्रु-निवारकोऽहं भवामि शम्भौ !
अर्थात् हे शम्भो ! कभी समाप्त न होनेवाली लक्ष्मी मेरे पास सदा-स्थिर होकर रहे और मैं काम-क्रोधादि सब प्रकार के शत्रुओं को दूर करने में समर्थ बनूँ।
मन्त्र-जाप- “ॐ अनृणा अस्मिन्, अनृणाः परस्मिन्, तृतीये लोके अनृणा स्याम। ये देव-याना उत पितृ-याणा, सर्वाण्यथो अनृणाऽऽक्षीयेम।”
रुद्राक्ष या रक्त-चन्दन की माला से प्रातःकाल यथा शक्ति पूर्व निर्देशानुसार जप करें। यदि समर्थ हो, तो किन्हीं वेदपाठी ब्राह्मण द्वारा ‘षडंग-शत-रुद्रीय’ में उक्त मन्त्र का ‘सम्पुट’ लगाकर भगवान शंकर का अभिषेक करे और सम्पुटित ११ पाठ कराए। आवश्यकतानुसार ‘शिव-महिम्न-स्तोत्र’ में भी उक्त मन्त्र का ‘सम्पुट’ लग सकता है। अभिषेक के बाद पुनः पूजन एवं मन्त्र-जप कर, निम्न स्तोत्र का पाठ करे-
जय देव जगन्नाथ, जय शंकर शाश्वत। जय सर्व-सुराध्यक्ष, जय सुरार्चित ! ।।
जय सर्व-गुणानन्त, जय सर्व-वर-प्रद ! जय सर्व-निराधार, जय विश्वम्भराव्यय ! ।।
जय विश्वैक-विद्येश, जय नागेन्द्र-भूषण ! जय गौरी-पते शम्भो, जय चन्द्रार्ध-शेखर ! ।।
जय कोट्यर्क-संकाश, जयानन्त-गुणाकर ! जय रुद्र-विरुपाक्ष, जय नित्य-निरञ्जन ! ।।
जय नाथ कृपा-सिन्धो, जय भक्तार्त्ति-भञ्जन ! जय दुस्तर-संसार-सागरोत्तारण-प्रभो ! ।।
प्रसीद मे महा-भाग, संसारार्त्तस्य खिद्यतः। सर्व-पाप-क्षयं कृत्वा, रक्ष मां परमेश्वर ! ।।
मम दारिद्रय-मग्नस्य, महा-पाप-हतीजसः। महा-शोक-विनष्टस्य, महा-रोगातुरस्य च।।
महा-ऋण-परीत्तस्य, दध्यमानस्य कर्मभिः। गदैः प्रपीड्यमानस्य, प्रसीद मम शंकर ! ।।
(स्क॰ पु॰ ब्रा॰ ब्रह्मो॰ ७।५९-६६)
फल-श्रुतिः
दारिद्रयः प्रार्थयेदेवं, पूजान्ते गिरिजा-पतिम्। अर्थाढ्यो वापि राजा वा, प्रार्थयेद् देवमीश्वरम्।।
दीर्घमायुः सदाऽऽरोग्यं, कोष-वृद्धिर्बलोन्नतिः। ममास्तु नित्यमानन्दः, प्रसादात् तव शंकर ! ।।
शत्रवः संक्षयं यान्तु, प्रसीदन्तु मम गुहाः। नश्यन्तु दस्यवः राष्ट्रे, जनाः सन्तुं निरापदाः।।
दुर्भिक्षमरि-सन्तापाः, शमं यान्तु मही-तले। सर्व-शस्य समृद्धिनां, भूयात् सुख-मया दिशः।।
उक्त स्तोत्र के २१ पाठ करने के बाद नीराजन करे। स्तोत्र के प्रति-पाठ के बाद एक बिल्व-पत्र गन्ध-पुष्प से युक्त कर भगवान् शिव को अर्पित करे। सांयकाल पुनः भगवान् शिव का पञ्चोपचार-पूजन कर मूल-मन्त्र (अनृणा॰॰॰) का एक माला-जप और ११ बार स्तोत्र का पाठ करे। इसके बाद आम के पत्ते को त्रि-मधु (दूध+ घी + शहद) में डुबोकर अग्नि में हवन करे। हवन विधि इस प्रकार है-
सायं सन्ध्या करने के बाद प्राणायाम कर तिथि आदि का उल्लेख करते हुए संकल्प करे-
‘मम ऋण-परिहारार्थं त्रयोदश्यधिपति-श्रीरुद्र-प्रीत्यर्थे प्रदोष-व्रतांग-भूतं आम्र-पत्र-होमं करिष्ये।’
तदन्तर अग्नि-स्थापन-पूर्वक प्रज्वलित अग्नि में हवन करे। पहले विनियोग पढ़े-
ॐ अस्य ऋण-मोचन-मन्त्रस्य कश्यप ऋषिः। विराट् छन्दः। त्रयोदश्यधिपतिः रुद्रो देवता। मम ऋण-परिहारार्थे आम्र-पत्र-होमे विनियोगः।
अब निम्न मन्त्र द्वारा ११ बार आहुतियाँ दे। कलियुग में चार गुणा अधिक का विधान है, अतः ५१ आहुतियाँ पूर्वोक्त विधि के अनुसार आम्र-पत्रों की देनी चाहिए-
आहुति-मन्त्रः- “ॐ सहस्त्र ज्वलन् मृत्युं नाशय स्वाहा। त्रयोदश्यधिपति-रुद्रायेदं न मम्।”
हवन के बाद नैर्ऋत्य-कोण की ओर मुख करके पूर्वोक्त ‘विनियोग’ का उच्चारण कर निम्न मन्त्र का ११ बार जप करे-
ॐ नमो भगवते ताण्डव-प्रियाय त्रयोदश्यधिपति-नील-कण्ठाय स्वाहा।
फिर ‘वायव्य-कोण की ओर मुख करके पूर्वोक्त ‘विनियोग’ का उच्चारण कर निम्न मन्त्र का ११ बार जप करे-
ॐ नमो भगवते ऋण-मोचन-रुद्राय अस्मद् ऋणं विमोचय हुं फट् स्वाहा।
तदन्तर ईशान-कोण की ओर मुख करके निम्न ‘विनियोग’ पढ़े-
ॐ अस्य श्रीअंगारक-मन्त्रस्य कश्यप ऋषिः। अनुष्टुप छन्दः। भौमो देवता। मम ऋण-परिहारार्थे जपे विनियोगः।
विनियोग के बाद निम्न मन्त्र का ११ बार जप करे-
ॐ अंगारक, मही-पुत्र, भगवन्, भक्त-वत्सल ! नमोऽस्तु ते। ममाशेष-ऋणमाशु विमोचय।
जप को परमेश्वर के प्रति अर्पित करे। इसके बाद मृत्तिका का पूजन करे। यह मिट्टी खेत के स्वच्छ स्थान से पहले ही मँगवा कर रख ले। पहले मिट्टी की प्रार्थना करे-
सर्वेश्वर-स्वरुपेण, त्वद्-रुपां मृत्तिकामिमाम्।
लिंगार्थ त्वां प्रि-गृह्णामि, प्रसन्न भव शोभने !।।
फिर नर्मदा या गंगा-जल मिलाकर उक्त मिट्टी का शिव-लिंग बनाए। उसका पूजन षोडशोपचार से करे। चने की दाल का नैवेद्य देकर पुष्पाञ्जलि प्रदान करे। तदनन्तर पुनः पूर्वोक्त मन्त्र ‘ॐ अनृणा॰॰॰’ का ११ माला जप तथा २१ पाठ स्तोत्र करे। फिर पुनः भगवान् का उनके नामों द्वारा पूजन करे। यथा-
पूर्वे भवाय क्षिति-मूर्तये नमः, ईशान्ये शर्वाय जल-मूर्तये नमः।
उत्तरे रुद्राभि-मूर्तये नमः, वायव्ये उग्राय वायु-मूर्तये नमः।
पश्चिमे भीमायाकाश-मूर्तये नमः, नैऋत्ये पशु-पतये यजमान मूर्तये नमः।
दक्षिणे महा-देवाय सोम-मूर्तये नमः। आग्नेये ईशानाय सूर्य-मूर्तये नमः।।
अन्त में आरती कर, निम्न प्रकार प्रार्थना करे-
भवांस्तुत्यमानां एवं, पशूनां पाश-मोचकः।
तथा व्रतेन सन्तुष्टः, ऋण-विमोचनं कुरु।।
ऋण-रोग-दारिद्रयादि-पाप-क्षुत्-ताप-मृत्यवः।
भय-शोक-मनस्तापाः, नश्यन्तु मम सर्वदा।।
दूसरे दिन प्रातःकाल मिट्टी के उक्त शिव-लिंग का पञ्चोपचार पूजन कर जल आदि में विसर्जन करे। इस प्रकार १२ प्रदोष-व्रत करे। नित्य केवल स्तोत्र-पाठ और ‘अनृणा॰॰” मन्त्र का जप करे।
इस प्रकार अनुष्ठान करने से भगवान् शिव की कृपा से निस्सन्देह ‘ऋण’ से छुटकारा मिलता है और लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।

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