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Tuesday, 25 October 2011

भाग्य नियंत्रण

स्वाभाविक है के हम चाहते हैं हमारे भाग्य पर हमारा नियंत्रण हो
केवल दो बातें –
* पहला अपने कर्म अच्छे रखें
* दूसरा जो ईश्वर दे रहा है उसे सहर्ष स्वीकार करें

चौंकिए मत, नाराज़ भी मत हों। मेरे पास नया कुछ नहीं है, केवल वही है जो वेद कहते हैं। वेदों से बाहर ज्योतिष भी तो नहीं। कहीं किसी वेद-पुराण में भाग्य बदलने की बात नहीं हुई, केवल कर्म बदलने की बात हुई है। जब कर्म-फल भोगना ही है तो उसे अगले जन्म पर क्यों टालना। मित्रो, जब तक आपके कर्म और उनके भोगे फल एक शून्य पर आकर नहीं मिल जाते जन्म पर जन्म, भुगतान पर भुगतान।

जब भी हम उपाय की बात करते हैं और उस मार्ग पर जाते हैं तो हम क्या कर रहे हैं –
पहला, अपनी भुगतान अवधि को अगले जीवन काल तक बढा रहे हैं
दूसरा, ईश्वर के किए इंसाफ को चुनौती देकर एक पाप और बढा रहे हैं

गीता में भगवान कृष्ण स्पष्ट कहते हैं – ज्ञानी को भी दुःख मिलता है, किंतु वह इसे भी मेरा दिया प्रसाद समझकर सहर्ष स्वीकार करता है। यही मुक्ति का मार्ग है।


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