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Friday, 19 August 2011

QURANIC QURANIC VATIKA

QURANIC VATIKA

Courtesy : UP Forest Department
हज़रत मोहम्मद साहब ने फर्माया है :- “आज से मक्के की धरती पर न तो किसी इन्सान क खुन होगा और न ही किसी जानवर का शिकार किया जायेगा और किसी हरे भरे दरख्त को भी नहीं कटा जायेगा।“
“आवश्य्कतानुसार सिर्फ़ ईज़्खिर घास काट सकते हो, कोई दूसरा हरा भरा व्रिक्श नहीं”
“जो व्यक्ति सिदार (Cedar) काटेगा उसका सर जहन्नुम की आग में ढकेल दिया जायेगा”
 “दरख्त लगाऒ और जब ईनसे मनुष्य फल खायेंगें या जान्वर चारा चरेंगें तो इसका उतना ही सवाब मिलेगा जइसे फल या चारा खिलाकर मिलता है”
प्रिथ्वी पर पाये जाने वाले जिन पेडों का नाम कुरान मजीद में आया है ऊन पेडों को प्रिथ्वी के दुसरे पेडों पर एक विशिश्ट्ता प्राप्त है। युं तो सारे पॆड पौधे “खालिके अरजो समा”(ईश्वर) के ही पैदा किये हुए है लेकिन कुछ पेड पौधौं का वर्णन अल्लाह ने खुद अपनी पुस्तक “कुरान मजीद” में किया है, जिसके कारण उन पेडों का महत्व बढ जाता है । ईन को लगाना इन की सुरक्शा करना और इन की देख भाल करना एक पुनीत कार्य है । इन से पार्यावरण भी शुद्ध होता है और आर्थिक लाभ भी होता है । कुरान में दिए गए कुछ पौधौं का वर्णन किया जा रहा है –
खजूर :
खजुर का अरबी नाम “नख्ल” है और “तमर” है । खजूर मनुष्य के लिए एक अच्छा आहार है । इस की पौ्ष्टिकता का पता ईसके वैग्यानिक चिकित्सकीय विश्लेशण से होता है । इस के फल में लगभग 60% इनवर्ट सुगर और स्युक्रोस के अतिरिक्त स्टार्च, प्रोटीन और वसा काफी मात्रा में मिलता है। इस के साथ ही विटामीन “ए”, विटामिन “बी”, विटामिन “बी12” विटामिन “बी” विटामिन “सी” भी पाये जाते हैं। इस में सोडियम, कैल्सियम, सल्फर, क्लोरीन, फास्फोरस और आइरन की पर्याप्त मात्रा में होना इस की पौ्ष्टिकता को प्रमाणित करता है। फलों में खजुर को Complete Food समझा जाता है।
  • हज़रत मोहम्मद साहब ने एक जगह फर्माया है “तुम खजूर नेहार मुंह खाया करो ऎसा करने से पेट के कीड़े मर जाते हैं”
  •  “खजूर खाने से गटिया का रोग नहीं होता” हज़रत मोहम्मद साहब
     
  • हज़रत मोहम्मद साहब ने फर्माया “खजूर में हर बिमारी से शिफा है, निहार मुंह खाने से यह जहरॊं को मारता है। इस पेड़ का उल्लॆख कुरान शरीफ में लगभग तीस बार किया गया है”
जैतुन :
 जै्तून का अरबी नाम जै्त या अल ज़ै्तून है । जैतून के कच्चॆ फल चटनी और अचार बनाने के काम में लायॆ जाते हैं । इस के पके हुए फल बहुत मीठे और स्वादिष्ट होते हैं । जैतून के तेल को खाने से मेदे की तेज़ाबियत दूर होती है। यह अल्सर को मिटाता है, चर्म रोगों मेम और मुख्यत: दाद जैसै चर्म रोगों के लिऎ बहुत लाभ्दायक है। हज़रत मोहम्मद साहब ने जैतून के सम्बन्ध में कहा है कि जैतून का तेल खाने में भी इस्तेमाल करो और मालिश में भी, इसलिए के यह मुबारक (सम्मान योग) तेल है। हज़रत मोहम्मद साहब ने एक बार फर्माया “जैतून का तेल खाओ, उसे लगाओ यह पाक और मुबारक है” । जैतून का उल्लेख कुरान में चार बार किया गया है।
अंगूर :
अंगूर को अरबी भाषा में “एनब” कहा जाता है । अंगूर ग्लुकोज़ और फ्रक्तोज़ प्राप्त करने का साधन है, यह तत्व अंगूर में 15% से 25% पायॆ जाते हैं। इस में टार्ट्रिक एसिड और मै्लिक एसिड भी प्रयाप्त मात्रा में मौ्जूद है, सोडियम, पो्टै्शियम, कै्ल्शियम और आय्रन की मात्रा भी इस में पायी जाती है । आर्थिक द्र्ष्टि में इस की खेती बहुत लाभदायक है । हज़रत मोहम्मद साहब के ज़माने में अंगूर की खेती मदीना व मक्का में बड़े पै्माने पर होती थी । कुरान शरीफ में इस का उल्लेख 11 बार किया गया है।
अनार:
 अनार का अरबी नाम रुम्मान है। अनार एक अद्भुत और कीमती फल है । इस का पेड, पत्तियां, फल सभी चिकित्स्किय द्र्स्टि से लाभ प्रद है। इस फल में बड़ी मात्रा में शकर (ग्लुकोज फ्रै्क्तोज) के अतिरिक्त मुख्य रुप से थाय्मिन और राइबोफ़्लेविन और विटामिन “सी” भी अच्छी मात्रा में पाया जाता है । सोडियम, कैल्सियम, सल्फर, क्लोरीन, फास्फोरस ,आक्ज़ेलिक अम्ल और केरोटीन प्राप्त करने का एक अच्छा साधन है । आर्थिक द्र्ष्टि से इस की खेती बहुत लाभदायक है ।
• हज़रत मोहम्मद साहब ने फर्माया “अनार खाओ यह मेदे को नया जीवन देता है, जिसने अनार खाया अल्लाह उसके दिल को रौशन कर देगा”
• हज़रत मोहम्मद साहब ने एक जगह कहा है कि ऎसा कोई अनार नहीं होता जिसमें जन्नत के अनारों का दाना शामिल न हो । अनार ह्रिदय के मरीज़ों के लिए बहुत लाभदायक है जिसका उल्लेख कुरान शरीफ में तीन बार किया गया है ।
अंज़ीर:
 अंज़ीर को अरबी भाषा में “तीन” कहा जाता है । अंज़ीर एक स्वादिष्ट मेवा है । इस के शुष्क फलों में 50 % से अधिक शकर होती है । इस के अतिरिक्त थोडी मात्रा में साइट्रिक एसिड, मैलिक एसिड भी इन में मिलते हैं । एक बहुत महत्व्पूर्ण तत्व फेसिन (FICIN), इस में पाया जाता है । जो पेट के रोगों में बड़ा लाभदायक है । गुर्दों को साफ करता है ।
  • हज़रत मोहम्मद साहब के पास कहीं से अंज़ीर से भरा हुआ थाल आया, उसे देख कर आपने फरमाया अगर कोई कहे कि कोई फल जन्नत से जमीन पर आ सकता है तो मैं कहूंगा कि यही वह है, क्योंकि अंज़ीर बिलाशुबह(नि:सन्देह) जन्नत का मेवा है । अंज़ीर बवासीर खत्म करता है और जोड़ों के दर्द (गटिया) में भी लाभ पहुंचाता है इस का उल्लेख कुरान शरीफ की सुर्ह “तीन” में हुआ है और इसमें अंज़ीर की कसम खायी गयी है ।
बेरी:
 बेरी का अरबी नाम “सिर्दह” है। बेरी के पेड़ की लकड़ी ईंधन के काम में आती है बेरी के पेड़ को बाड़ के रुप में लगाया जाता है इसके फल भी खाये जाते है । फल व पत्तियां औषधि के काम में भी लायी जाती है । सिरदह का नाम कुरान शरीफ़ में तीन बार किया गया है कुछ विद्वानों ने सिर्दह को ऎसा पेड़ बताया है जो देवदार की तरह होता है । जिसको अंग्रेज़ी में सीदार भी कहते हं । यह लेब्नान का पेड़ है ।
शज़रे मिस्वाक (पीलू) :
 शज़रे मिस्वाक की लकड़ी में नमक और खास क़िस्म का रेजिन पाया है । जो दातों में चमक पैदा करता है । मिसवाक करने से जब इस की एक तह दातों पर जम जाती है तो कीड़े आदि से दन्त सुरक्शित रहतें हैं । इस प्रकार चिकित्सकिय द्रिष्टि से मिस्वाक दान्तों के लिए बहुत लाभदायक है । पीलू को कुरान शरीफ में सूरह “सबा” में खम्त का नाम दिया गया है ।
  • हज़रत मोहम्मद साहब ने मिसवाक के दस फायदे बताये है । मिसवाक मुंह को खुश्बुदार करती है, मसूढों को मज़बूत करती है, नज़र को तेज़ करती है, बलगम निकालती है, सोजिश दूर करती है, भूख बढाती है इत्यादि ।
  • हज़रत मोहम्मद साहब ने मिसवाक करने पर जोर दिया है और हो सकता था कि हर नमाज से पहले इसको फर्ज कर दिया जाता था ।
मेंहदी :
 मेंहदी का पेड़ भारतीय समाज में बड़ा महत्व रखता है । इसके फुलों से “इतरे हिना” हाहिल किया जाता है जो अपनी खुश्बू से दिल व दिमाग दोनो को ताज़गी पहुंचाता है । शादी विवाह एवं दूसरे धार्मिक त्योहारों और दावतों में इस का इस्तेमाल ज़रुरी समझा जाता है । हिना की पत्तियों से खेजाब बनाना, औरतों के हाथ पैर की मेहंदी के रन्गों से सजाना, आज भी हमारे समाज में बहुत लोक्प्रिय है, मेहंदी के पेड़ अधिक्तर लोग अपने घरों में लगाते हैं । शादी के अवसर पर वर-वधू को मेहंदी लगायी जाती है ।
हज़रत मोहम्मद साहब ने फरमाया कि “अल्लाह के नज़दीक दरख्त (पेड़ों) में निहायत प्यारा पौधा मेहंदी का है” कुरान की सुरह “देहर” की आयज में काफूर का उल्लेख किया गया है, जिसको बाज़ विद्वानों ने हिना भी बताया है । जब कभी हज़रत मोहम्मद साहब को जख्म होता या कांटा चुभ जाता तो आप उस पर मेहंदी का लेप लगाया करते थे ।
बबूल
 बबूल की एक किस्म जो अरब मेम पायी जाती है उसे तलहा कहते है और इसी नाम से कुरान शरीफ की सुरह “वाक्या” में बबूल का उल्लेख किया गया है तलहा को कुछ लोग केले का पौधा भी कहते हैं । भारत में इसे बबुल के नाम या केकड़ भी कहते हैं इसके पेड़ से गोंद निकाली जाती है आर्थिक लाभ के लिए पेड़ को लगाना लाभदायक होता है । इस की गोंद विश्व के अनेकों व्यापारिक प्रतिस्टानों में प्रयोग की जाती है । इस की गोंद केक, पेस्ट्रीज, आइस्क्रीम और अन्य पेय पदार्थो के अतिरिक्त दवाआ, पेन्ट और स्याही वगैरह में भी इस्तेमाल होती है । बच्चे के जन्म के बाद माता को घी में तला हुआ गोंद खिलाने से खून की कमी दूर होती है, और शरीर को ताकत मिलती है । चिकित्सीय द्रिष्टी से यह एक बेहतरीन कार्बोहाइड्रेट पौलीमर है जिसमें डी-गैलेक्टोस एल-अरैबिनोज़ व युरोनिक एसिड है ।
 तुलसी:
 तुलसी की एक किस्म को कुरान शीफ में दो बार “रेहान” के नाम से उल्लेख किया गया है । तुलसी (रेहान) की पत्तियां और फूल दोनो ही खुश्बूदार होतें हैं । इन से खुश्बूदार तेल निकलता है जिसमें मेथाइल सिन्नामेट, लिनालूल और टरपीनेन के तत्व मिलतें हैं । इसके फुल और पत्तियां दोनो ही स्टीमुलेन्ट, कार्मिनेटिव, देमल्सेण्ट हैं, पूरा पौधा ही कीटाणुनाशक की खुसूसियत रखता है इसके बीज यूनानी औषधि में मेदे की तकलीफ में दिए जाते हैं । ये बीज निहायत लोआब्दार होते हैं । ये जिर्यान और पेचिश जैसे रोगों की अचूक दवा है । यह खांसी में भी बहुत लाभदायक है ।

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