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Thursday, 4 August 2011

विजयादशमी

 इस दिन संध्या के समय नीलकंठ पक्षी का दर्शन शुभ माना जाता है 
 
 
  क्षत्रिय/राजपूतों के लिए पूजन विधि  साधक को चाहिए कि इस दिन प्रातः स्नानादि नित्य कर्म से निवृत्त होकर निम्न संकल्प लें-   मम क्षेमारोग्यादिसिद्ध्‌यर्थं यात्रायां विजयसिद्ध्‌यर्थंगणपतिमातृकामार​्गदेवतापराजिताशमीपूजनानि करिष्ये। 
  
  विजयादशमी के दिन भगवान रामचंद्रजी के लंका पर चढ़ाई करने के लिए प्रस्थान करते समय शमी वृक्ष ने भगवान की विजय का उद्घोष किया था।
विजयकाल में शमी पूजन इसीलिए होता है। इस पर्व को भगवती के 'विजया' नाम पर भी 'विजयादशमी' कहते हैं। शमी पूजन के उपरांत शमी के पेड़ की जड़ से थोड़ी मिटटी व शमी की कुछ पत्ती को लेकर अपने धन रखने के स्थान ( तिजोरी ) पर रखने से धन में वृद्धि होती है | इस दिन भगवान रामचंद्र चौदह वर्ष का वनवास भोगकर तथा रावण का वध कर अयोध्या पहुँचे थे। इसलिए भी इस पर्व को 'विजयादशमी' कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि आश्विन शुक्ल दशमी को तारा उदय होने के समय 'विजय' नामक मुहूर्त होता है। यह काल सर्वकार्य सिद्धिदायक होता है। इसलिए भी इसे विजयादशमी कहते हैं।      

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