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Wednesday, 10 August 2011

कुल-देवता की प्रसन्नता

अभीष्ट फल दायक बाह्य शान्ति सूक्त

             अभीष्ट फल दायक बाह्य शान्ति सूक्त
(कुल-देवता की प्रसन्नता के लिए अमोघ अनुभूत सूक्त)

नमो वः पितरो, यच्छिव तस्मै नमो, वः पितरो यतृस्योन तस्मै।
नमो वः पितरः, स्वधा वः पितरः।।1
नमोऽस्तु ते निर्ऋर्तु, तिग्म तेजोऽयस्यमयान विचृता बन्ध-पाशान्।
यमो मह्यं पुनरित् त्वां ददाति। तस्मै यमाय नमोऽस्तु मृत्यवे।।2
नमोऽस्त्वसिताय, नमस्तिरश्चिराजये। स्वजाय वभ्रवे नमो, नमो देव जनेभ्यः।।3
नमः शीताय, तक्मने नमो, रूराय शोचिषे कृणोमि।
यो अन्येद्युरूभयद्युरभ्येति, तृतीय कायं नमोऽस्तु तक्मने।।4
नमस्ते अधि वाकाय, परा वाकाय ते नमः। सुमत्यै मृत्यो ते नमो, दुर्मत्यै त इदं नमः।।5
नमस्ते यातुधानेभ्यो, नमस्ते भेषजेभ्यः। नमस्ते मृत्यो मूलेभ्यो, ब्राह्मणेभ्य इदं मम।।6
नमो देव वद्येभ्यो, नमो राज-वद्येभ्यः। अथो ये विश्वानां, वद्यास्तेभ्यो मृत्यो नमोऽस्तु ते।।7
नमस्तेऽस्तु नारदा नुष्ठ विदुषे वशा। कसमासां भीम तमा याम दत्वा परा भवेत्।8
नमस्तेऽस्तु विद्युते, नमस्ते स्तनयित्नवे। नमस्तेऽस्तु वश्मने, येना दूड़ाशे अस्यसि।।9
नमस्तेऽस्त्वायते, नमोऽस्तु पराय ते। नमस्ते प्राण तिष्ठत, आसीनायोत ते नमः।।10
नमस्तेऽस्त्वायते, नमोऽस्तु पराय ते। नमस्ते रूद्र तिष्ठत, आसीनायोत ते नमः।।11
नमस्ते जायमानायै, जाताय उत ते नमः। वालेभ्यः शफेभ्यो, रूपायाघ्न्ये ते नमः।।12
नमस्ते प्राण क्रन्दाय, नमस्ते स्तनयित्नवे। नमस्ते प्राण विद्युते, नमस्ते प्राण वर्षते।।13
नमस्ते प्राण प्राणते, नमोऽस्त्वपान ते।
परा चीनाय ते नमः, प्रतीचीनाय ते नमः, सर्वस्मै न इदं नमः।।14
नमस्ते राजन् ! वरूणा मन्यवे, विश्व ह्यग्र निचिकेषि दुग्धम्।
सहस्त्रमन्यान् प्रसुवामि, साकं शतं जीवाति शरदस्तवायं।।15
नमस्ते रूद्रास्य ते, नमः प्रतिहितायै। नमो विसृज्य मानायै, नमो निपतितायै।।16
नमस्ते लांगलेभ्यो, नमः ईषायुगेभ्यः। वीरूत् क्षेत्रिय नाशन्यप् क्षैत्रियमुच्छतु।।17
नमो गन्धर्वस्य, नमस्ते नमो भामाय चक्षुषे च कृण्मः।
विश्वावसो ब्रह्मणा ते नमोऽभि जाया अप्सासः परेहि।।18
नमो यमाय, नमोऽस्तु, मृत्यवे, नमः पितृभ्य उतये नयन्ति।
उत्पारणस्य यो वेद, तमग्नि पुरो दद्येस्याः अरिष्टतातये।।19
नमो रूद्राय, नमोऽस्तु तक्मने, नमो राज्ञ वरूणायं त्विणीमते।
नमो दिवे, नमः पृथिव्ये, नमः औषधीभ्यः।।20
नमो रूराय, च्यवनाय, रोदनाय, घृष्णवे। नमः शीताय, पूर्व काम कृत्वने।।21
नमो वः पितर उर्जे, नमः वः पितरो रसाय।।22
नमो वः पितरो भामाय, नमो वः पितरा मन्धवे।।23
नमो वः पितरां पद घोरं, तस्मै नमो वः पितरो, यत क्ररं तस्मै।।24

विधि:-
1. पूजा पाठ से पहले दक्षिणाभिमुख होकर एक सूक्त का पाठ करना है।
2. नित्य पाठ एवं हवन आवश्यक है।
3. उक्त सूक्त के 24 श्लोकों में से 22 वें, 23 वें, और 24 वें श्लोक का पाठ दो बार अतिरिक्त करें। अर्थात् पहले 1 से 24 तक पाठ कर लें, फिर 22, 23 व 24 वें श्लोकों को दो बार और पाठ करें। इस प्रकार उक्त तीन श्लोकों का पाठ तीन बार होगा। तब इस ‘सूक्त’ का एक पाठ पूर्ण होगा।
4. काले तिल एवं शुद्ध घी से हवन। हवन में भी उक्त तीन श्लोकों से तीन-तीन आहुतियाँ दी जायेगी।
5. दक्षिण दिशा की ओर मुख करके ही पाठ व हवन करें।
6. केवल एक आवृत्ति पाठ और एक ही आवृत्ति से हवन करें।

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