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Tuesday, 16 August 2011

वास्तु शास्त्र

वास्तु शास्त्र में दिशाओ को विशेष स्थान प्राप्त है जो इस विज्ञानं का आधार है | यह दिशाए प्राकृतिक उर्जा और ब्रम्हांड में व्याप्त रहस्यमयी उर्जा को संचालित करती है | जो रजा को रंक और कानर को रजा बनाने की शक्ति रखती है | इस शास्त्र के अनुसार प्रत्येक दिशा में अलग - अलग तत्व संचालित होते है | और उनका प्रतिनिधित्व भी अलग - अलग देवताओ द्वारा होता है | जो इस प्रकार है -
~ उत्तर दिशा के देवता कुबेर है जिन्हें धन का स्वामी कहा जाता है और सोम को स्वास्थ्य का स्वामी कहा जाता है |जिससे आर्थिक मामले , वैवाहिक व् यौन सम्बन्ध तथा स्वास्थ्य प्रभावित होता है |
~ उत्तर पूर्व (इशान कोण ) के देवता सूर्य है जिन्हें रोशनी और ऊर्जा तथा प्राणशक्ति का मालिक कहा जाता है | इससे जागरूकता , बुद्धि के मामले प्रभावित होते है |
~ पूर्व दिशा के देवता इन्द्र है जिन्हें देवराज कहा जाता है | आमतौर पर सूर्य को ही इस दिशा का स्वामी माना जाता है जो प्रत्यक्ष रूप से सम्पूर्ण विश्व को ऊर्जा और रोशनी दे रहे है | लेकिन वास्तुनुसार इसका प्रतिनिधित्व देवराज करते है जिससे सुख - संतोष तथा आत्मविश्वास प्रभावित होता है |
~ दक्षिण - पूर्व ( आग्नेय कोण ) के देवता अग्निदेव है जो अग्नितत्व का प्रतिनिधित्व करते है | जिससे पाचन शक्ति , धन तथा स्वास्थ्य मामले प्रभावित होते है |
~ दक्षिण दिशा के देवता यमराज है जो मृत्यु देने के कार्य को अंजाम देते है | जिन्हें धर्म राज भी कहा जाता है | इनकी प्रसन्नता से धन , सफलता , खुशिया , शांति प्राप्त होती है |
~ दक्षिण - पश्चिम दिशा में देवता निरति है जिन्हें दैत्यों का स्वामी कहा जाता है | जिससे आत्म्शुद्धता और रिश्तो में सहयोग तथा मजबूती एवं आतु प्रभावित होती है |
~ उत्तर पश्चिम दिशा के देवता पवन देव है | जो हवा के स्वामी है | जिससे सम्पूर्ण विश्व में वायु तत्व संचालित होता है | यह दिशा विवेक और जिम्मेदारी योग्यता , योजनाओ एवं बच्चो को प्रभावित करती है |
वास्तुशास्त्र में जो दिशा निर्धारण किया जाता है वह प्रत्येक पंच तत्वों के संचालन में अहम् भूमिका निभाता है | इन दिशाओ के अनुकूल रहने से जीवन सुख - सम्रद्धि से परिपूर्ण हो जाता है |

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