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Saturday, 16 June 2012

यदि कभी आकाश

यदि कभी आकाश में गंधर्व नगर (बादलों का एक ग्राम के समान आकार में) दिखाई दे, ग्रहण के समय या अन्य काल में दिन में ताराओं का दिखना, उल्का पाथ दिन या रात्रि में, अचानक वर्षा के साथ काष्ठ(लकडी), तृण (घास) या रक्त की वर्षा, दिशाओं में आग लग जाने की प्रतीति, दिशाओं में धूल का गुबार, भूकम्प, रात्रि में इन्द्र धनुष, किसी पर्वत या वृक्ष पर उजले वर्ण का कौआ बैठा आदि दिखाई देवे तथा गाय, हाथी और घो़डों के दो या तीन मस्तक वाला बच्चा पैदा हो, प्रात: काल एक साथ सभी दिशाएं सूर्याेदय जैसी आभा से युक्त हो, आकाश में धूमकेतुओं का दिखना, रात्रि में कौओं का और दिन में कबूतरों का क्रन्दन (रोने की आवाज) सुनने को मिले, तो किसी अनिष्ट या अशुभ की पूर्व सूचना होती है। जिसको, जहां, जिस समय, जो लक्षण दिखे उसी स्थान पर उसी दृष्टा से सम्बन्धित अनिष्ट आता है।


इसी प्रकार जब देवमंदिर में देवमूर्ति में किसी भी प्रकार की सूक्ष्मतम हलचल जैसे मूर्ति को पसीना आना, हंसना, रोना, धुंआ उठना, रक्त के छींटे आना या रक्त निकलना, दूध या जल का पीना या मुंह से निकलना अथवा स्थान परिवर्तन हो जाये तो यह विकार अशुभ की सूचना देते हैं। उपरोक्त में से हंसना-रोना या पसीना आना या दूध पीने की घटना तो देखने में आई हैं, किन्तु अन्य घटनाएं भी शायद पहले होती रही हाेंगी।

इसी तरह यदि किसी वृक्ष में असमय फल या पुष्प आवें यह अशुभ घटना की पूर्व सूचना होती है। ऎसे वृक्ष को तत्काल काटकर या उख़ाड कर फेंक देना चाहिये और अगले दिन दूसरा कोई वृक्ष लगा देना चाहिये। उपरोक्त विकारों की शान्ति के लिये आयुष्य बढ़ाने वाला मंत्रों का जाप, अपने इष्टदेव के मंत्रों का या नाम का सुमिरन और हवन सहित ग्रह शान्ति तत्काल ही करनी चाहिए।

एक बात और ध्यान रखने की है कि इन अपशकुनों के प्रभाव किसी व्यक्ति विशेष तक ही सीमित न होकर समूह विशेष या ग्राम या शहर पर अपना अशुभ प्रभाव डालते हैं।

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