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Saturday, 3 September 2011

पक्ष और ग्रहण

पक्ष और ग्रहण के सम्बन्ध में जानकारी
एक महीने में दो पक्ष होते है -----पहला पक्ष कृष्ण पक्ष और दूसरा पक्ष शुक्ल पक्ष |
कृष्ण पक्ष में अमावस्या होती है और शुक्ल पक्ष में पूर्णिमा होती  है जब भी ग्रहण होते है तो अमावस्या को सूर्य ग्रहण होता है | पूर्णिमा को चन्द्र ग्रहण होता है |
पूर्णिमा के बाद का पहला दिन [ प्रतिपदा ] कृष्ण पक्ष का होता है, जबकि अमावस्या के बाद का पहला दिन [ प्रतिपदा ] शुक्ल पक्ष का होता है |
तिथियों की पूर्ण जानकारी
तिथियाँ १५ होती है और पक्ष में भी १५ होती  है |
तिथियों के स्वामी ---- प्रतिपत का स्वामी = अग्नि द्वितीय का = ब्राह्ग  , तृतीया का स्वामी =  पार्वती शिव , चतुर्थ का स्वामी = गणेशजी , पंचमी का स्वामी =सर्पदेव ( नाग ) , षष्ठी का स्वामी = कार्तिकेय , सप्तमी का स्वामी = सूर्यदेव , अष्टमी का स्वामी = शिव , नवमी का स्वामी = दुर्गाजी , दशमी का स्वामी = यमराज , एकादशी का स्वामी = विश्वदेव , द्वादशी का स्वामी = विष्णु भगवान , त्रयोदशी का स्वामी = कामदेव , चतुर्दशी का स्वामी = शिव , पूर्णिमा का स्वामी = चन्द्रमा , अमावस्या का स्वामी = पित्रदेव |
नोट -- जिस देवता की जो विधि कही गई है उस तिथि में उस देवता की पूजा , प्रतिष्ठा , शांति विशेष हितकर होती है |
तिथियों के अनुसार शुभ जानकारी --
 प्रथम खंड
 द्वितीय खंड
 तृतीय खंड
 नाम 
प्रतिपत
षष्ठी
 एकादशी
 नंदा 
द्वितीया
 सप्तमी 
 द्वादशी 
 भद्रा
 तृतीया
 अष्टमी 
 त्रयोदशी 
 जया
 चतुर्थी 
 नवमी 
 चतुर्दशी 
 रिक्ता
 पंचमी 
 दशमी 
पूर्णिमा
 पूर्ण 
 नोट -- शुक्ल पक्ष में नंदा , भद्रा  , जया , रिक्त , और पूर्ण क्रम से अशुभ , मध्य और शुभ होती है |
अर्थात  शुक्ल पक्ष में ऊपर लिखी हुई
प्रथम खंड की पांच तिथियाँ  अशुभ होती है |
 द्वितीया खंड की पाँच तिथियाँ मध्यम
और तृतीया के पाँच तिथियाँ उत्तम होती है |

इसी तरह कृष्ण पक्ष में--   
प्रथम खंड की पाँच तिथियाँ शुभ होती है |
द्वितीया की  पाँच तिथियाँ मध्य होती है |

तृतीया से  पाँच तिथियाँ अशुभ होती है |


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