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Saturday, 24 September 2011

विशेष


यदि आप अपने किसी कार्य का समाधान चाहते है, यदि आपकी कोई समस्या है जिसके कारण आप और आपका परिवार संकटों के दोर से गुजर रहा है तो आप अपने कार्य हेतु संपर्क करके अपनी समस्या का समाधान जान सकते है

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. घर-परिवार को एक सूत्र में बांधे इस तरह -

अपने परिवार को सदैव एकत्रित करने के लिए एक सरल उपाय है कि आप अपने बैठक खाने के दक्षिण पश्चिम दिशा में सारे परिवार के सदस्यों की प्रसन्नचित्त मुद्रा वाले छायाचित्र लगाइए। यह उपाय उन घरो के लिए और भी प्रभावशाली है जहाँ अक्सर झगडे होते है जैसे बाप-बेटे में, सास-बहु में आदि। इनके आपसी प्रेमभाव को बढ़ने के लिए इनकी हँसते हुए प्रसन्नचित्त मुद्रा वाला छायाचित्र लगायें।

2. बुद्धि में वृद्धी करें इस तरह से -

गायत्री प्रधानता बुद्धि को शुद्ध, प्रखर और समुन्नत करने वाला मंत्र है। मंत्र, बुद्धि, स्मरण शक्ति की कमी वाले बालक इससे विशेष रूप से लाभ उठा सकते है जो बालक अनुतीर्ण हो जाते है, अपना पाठ ठीक तरह से याद नही कर पते है उनके लिए यह उपासना उपयोगी है।

सूर्योदय के समय की प्रथम किरणों को पानी से भीगे हुए मस्तक पर लगने दे। पूर्व की और मुख करके अधखुले नेत्रों से सूर्य दर्शन करते हुए आरम्भ में तीन बार "ई" का उच्चारण करते हुए गायत्री का जप करे। कम से कम १०८ मंत्र अवश्य जपने चाहिए।

हाथो की हथेलियाँ सूर्य की ओर इस प्रकार करें मानो आग ताप रहे हो इस स्थिति में बारह बार मंत्र जपकर हथेलियों को आपस में रगड़ना चाहिए और उन उष्ण हाथो को मुख, नेत्र, नासिका, ग्रीवा, कर्ण, मस्तक आदि समस्त शिरोभागो पर फिराना चाहिए।

3. आर्थिक समृद्धि होने पर -

घर में वास्तुदोष हो तो समृद्धि की वृद्धि नही होती है। व्याधि, लड़ाई-झगडे आदि में धन का नाश होता है। इससे रक्षा हेतु ढक्कन सहित चंडी की एक लुटिया लें। उसमें गंगाजल डालकर उसकी गर्दन पर कलावे में मूंगा पिरोकर बाँध दें। उसके बाद ढक्कन लगा दे और इसे घर की उत्तर-पूर्व दिशा में स्थापित करें।

4. धन की तीव्र इच्छा पूर्ति के लिए -

यदि विशेष धन की इच्छा हो तो चोदहमुखी रुद्राक्ष स्वर्ण में जड्वाकर मंगलवार के दिन स्थापित करके दूध, दही, घी, मधु, शक्कर से बरी-बरी से गंगाजल या शुद्ध ताज़े जल से स्नान कराकर धुप, दीप से पूजन करके सोने की चैन या धागे को गले में धारण करें तथा निम्न: मंत्र का ४२ दिन तक एक माला नित्य जाप करें।

मंत्र - ऊं हीं नम: मम ग्रहे धनम कुरु कुरु स्वाहा।

5. संपत्ति में वृद्धि के लिए -

अगर आप समझते है कि आपकी पैत्रिक संपत्ति में वृद्धि नही हो रही है, बल्कि कटोती हो रही है, तो इस उपाय को करें: किसी भी वृहस्पतिवार को बाज़ार से जल कुम्भी लेकर आयें। उसे पीले-कपडे में बांधकर घर में कहीं पर लटका दें। उसको बार-बार छुना नही। एक सप्ताह के बाद उसको बदल कर नई कुम्भी ऐसे ही बाँध दें। इसको सात वृहस्पतिवार करें।

6.पर्स भरा रखे ऐसे -

लक्ष्मी का स्वरूप माने जाने वाला एक श्री बीज मंत्र ' हीं ' अत्यधिक प्रभावशाली एवं चमत्कारी है। इसके प्रयोग अदभुत है। आप बीज मंत्र की शक्ति को आजमाकर देखें। किसी भी शनिबार के दिन नित्य कर्म स्नानादि से निवृत होकर शनि की होरा में एक साबुत पीपल का पत्ता तोड़कर ले आयें। जब आप घर से निकले तब से लेकर पत्ते को लाने तक आप मोन ही रहे तथा मन में 'ऊं नमो नारायण' मंत्र का जाप करते रहे। फिर उस पत्ते को गंगाजल अथवा किसी तीर्थ स्थान के जल से धोकर अष्टगंध कि स्याही से अपने हाथ कि अनामिका ऊँगली से ' हीं ' लिख लें। फिर धुप दीप करके पत्ते को उक्त पूजा के साथ नए पत्ते से बदलें। पुराने पत्ते को किसी बहते जल में प्रवाहित करें अथवा किसी पूजा स्थान पर छोड़े दें। इस पत्ते को आप अपनी दूकान आदि में पैसे रखने के स्थान पर अथवा जेब में भी रख सकते है। विशेष ध्यान यह रहे की पत्ता कभी कमर से नीचे न रखे।

7. सफलता के लिए -

अक्सर देखा गया है कि व्यक्ति तथा बच्चा पूर्णतया कार्यकुशल होने पर भी काम से दिल चुराता है, तो इसे अनुकूल करने के लिए ऐसा करे: रविवार के दिन शराब की एक बोतल लेकर पहले भैरव जी को अर्पण करें। इसके बाद व्यक्ति या बच्चे के सर के ऊपर से सात बार वार कर किसी को दान कर दें, या चोराहे अथवा शमशान घाट पर रख आयें। आप देखेंगें की परिस्थितियों में तुरंत सुधर होने लगेगा।

8. व्यापर में लगातार घटा हो रहा हो -

यदि किसी के व्यापर में लगातार नुक्सान हो रहा हो तो किसी भी बुधवार के दिन यह प्रयोग शुरू कर सकते है। यह प्रयोग कम से कम पांच सप्ताह तक लगातार करना आवश्यक होता है। प्रयोग को प्रारंभ करने वाले बुधवार को पीली कोडी लें, एक जोड़ा लोंग लें, एक जोड़ी छोटी इलायची तथा अपने व्यापर स्थल की एक चुटकी मिटटी लेकर इन कोडियों को जला लें जो इनकी राख बनेगी। उस राख को एक पान के पत्ते में तांबे का सिक्का लें जिसमें एक छेद कर ले। इस सारी सामग्री को छेद वाले सिक्के के साथ किसी बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें। जिस दिन सारी सामग्री को जल में प्रवाह करें उस दिन का उपवास रखें तथा किसी नौ वर्ष से छोटी कन्या को भोजन कराएँ।

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