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Friday, 2 September 2011

कालसर्प दोष

कालसर्प दोष–एक अभिशाप

जब कुंडली में राहु और केतु अपने घेरे में सभी ग्रहों को ले लेते है, इसे ही कालसर्प योग कहते है। कालसर्प योग को हम एक अन्य नाम नागपाश योग से भी पुकारते है। कालसर्प योग वाले जातक को आजीवन कष्ट, ऋण, बेरोजगारी, सन्तानहीनता, दाम्पत्यजीवन में सुख का अभाव होना इत्यादि कष्ट भोगने पड़ते है। कालसर्प योग 12 प्रकार के होते है एवं उनका फल भी भिन्न–भिन्न होता है
1. अनन्त कालसर्प योग : जब लग्न में राहु बैठ जाए एवं सप्तम में केतु बैठ जाए एवं बाकी ग्रह इन दोनो के दायीं ओर हो या बायी ओर हो तो अनन्त कालसर्प योग का जन्म होता है। इसके कारण जातक का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहेगा एवं साथ–साथ मानसिक अशान्ति भी रहेगी। परन्तु राहु के फल में राशि कौन सी है उससे भी कम ज्यादा का अन्तर पड़ जाता है। यदि लग्न वृषभ, मिथुन या मकर हो तो स्थिति कम घातक होगी अन्य राशि होने पर ज्यादा घातक होगी।
उपाय : महामृत्युंजय का जाप करना लाभप्रद होगा।
2. कुलिक कालसर्प योग : जब द्वितीय स्थान में राहु बैठ जाए एवं अष्टम में केतु बैठ जाए एवं बाकी ग्रह इन दोनों के दायी या बायी ओर हो तो जातक को धन हानि होगी । उसे दायीं आंख में परेशानी रहेगी एवं नाक व गले के रोग भी परेशान करते रहेगे। कुलिक कालसर्प योग के कारण वाणी भी प्रभावित होती रहती है, एवं जातक पारिवारिक एवं कुटुम्ब के सुख में कमी महसूस करता है। परिजनों से सामन्जस्य का अभाव रहता है। इस प्रकार से वह पारिवारिक रूप से परेशान हो जाता है। यदि राहु पर अन्य पापग्रहों का भी प्रभाव हो एवं कुंडली किसी स्त्री/कन्या की हो तो उसका विवाह देरी से होगा एवं दाम्पत्य जीवन में भी परेशानी होगी। (यदि सप्तम में गुरू न हो)
उपाय : 108 नाग–नागिन के जोड़े जल में प्रवाहित करने चाहिए।
3.वासुकी कालसर्प योग : जब तृतीय स्थान में राहु व नवम् में केतु बैठ जाए एवं बाकी ग्रह इन दोनों के दायी या बायी ओर हो तो जातक को भाई बहिनों के कारण कष्ट या परेशानी बनी रहेगी एवं भाग्योदय में अडचने एवं विलम्ब के कारण आर्थिक एवं मानसिक तनाव रहेगा। एवं चर्मरोग एवं पैरो से सम्बन्धित रोग भी पैदा होता है। ऐसे जातक को साझेदारी का कार्य नहीं करना चाहिए।
उपाय : नागपंचमी के दिन सांपो को दूध पिलाये।
4.शंखपाल कालसर्प योग : जब चतुर्थ स्थान में राहु व दशम में केतु बैठ जाए एवं बाकी ग्रह इन दोनों के दायी या बायी ओर हो तो जातक को माता से वैचारिक मतभेद या माता को कष्ट, विवाह जम्म स्थान से दूर, विवाह विलम्ब से होने के आसार, दाम्पत्य जीवन के प्रारम्भ में कठिनाई एवं विद्या अर्जन में कठिनाई, मकान एवं वाहन इत्यादि में कठिनाई, पैत्रिक सम्पत्ति के मिलने में अड़चने गले एवं कन्धे की परेशानी एवं पारिवारिक सुख का अभाव रहता है।
उपाय : शिवलिंग पर चांदी के सर्प चढ़ाये।
5.पदम् कालसर्प योग : जब पंचम स्थान में राहु व एकादश में केतु बैठ जाए एवं बाकी ग्रह इन दोनों के दायी या बायी ओर हो तो जातक/जातिका को सन्तान उत्पत्ति में बाधा उत्पन्न होती है। जातिका का मासिक धर्म अनियमित हो जाता है। संतान सुख में विलम्ब करता है यौन/प्रसव सम्बन्धी रोगो से ग्रस्त होने की आशंका रहती है। एवं प्रेम विवाह में भी रूकावटें आती है। उच्च शिक्षा प्राप्ति में अड़चने अर्थात मन न लगना भी पदम् कालसर्प योग के कारण होता है।
उपाय : चांदी का ठोस हाथी शयनकक्ष में रखें।
6.महापद्म कालसर्प योग : जब छठे स्थान में राहु व बारहवे में केतु बैठ जाए एवं बाकी ग्रह इन दोनों के दायी या बायी ओर हो तो जातक कर्जे से बॅध जाता है। एवं बीमार होकर दवाईयों में पैसा खर्च होता रहेगा। जातक का स्वास्थ्य कमजोर रहता है। एवं अकारण ही दुश्मनी होती रहती है व अचानक चोट लगने की आशंका भी रहती है। जिसके कारण कोर्ट कचहरी के व्यर्थ ही चक्कर लगाने पडे़गे। इस प्रकार से वह भारी कर्जे से लद जाता है।
उपाय : अमावस्या के दिन पितरों को शान्त कराने हेतु दान आदि करें तथा कालसर्प योग शान्ति पाठ कराये।
7. तक्षक कालसर्प योग : जब सातवे स्थान में राहु व लग्न में केतु बैठ जाए एवं बाकी ग्रह इन दोनों के दायी या बायी ओर हो तो जातक का दाम्पत्य जीवन कष्टकारी बनाता है। सप्तम में राहु मारक प्रभाव युक्त होता है। यहां बैठकर राहु प्रथकता, अलगाव, मतभेद एवं दाम्पत्य सुख में कमी करता है एवं जातक को राहु सम्पत्ति से भी पृथक करता है। एवं साझेदारी के कार्य में साझेदारों द्वारा धोखा होना एवं गुप्त रोग होने की आंशका रहती है। जातक को कष्ट ही कष्ट उठाने पड़ते है। आर्थिक दृष्टि से परेशानी पैदा करता है। आय के श्रौत बन्द होते नजर आते है। आर्थिक स्थिति डांवाडोल सी रहती है। बड़े भाई का सहयोग प्राप्त नही हो पाता है एवं बांए कान की बीमारी से ग्रसित होने की आंशका रहती है। यदि राहु के साथ शुक्र व मंगल भी हो तो जातक/जातिका के अनेको प्रेम सम्बन्ध होते है। इस कालसर्प योग वाले जातक को यदि वह बिजनेसमैन है तो लाभ हेतु भारी मशक्कत उठानी पड़ती है। जहां लाभ होना चाहिए वहां हानि की आंशका बनी रहती है। बहुत से सार्थक प्रयास सफल नहीं हो पाते है।
उपाय : शनिवार को पीपल पर शिवलिंग चढ़ाये व मंत्र जाप करें (ग्यारह शनिवार तक)
8.कर्कोटक कालसर्प योग : तलाक की आशंका अधिक रहती है। यदि अष्टम में राहु 1, 4 व 8 राशियों में हो तो जातिका को आपरेशन से संतान होती हैै। राहु अष्टम में बैठकर पेट सम्बन्धी परेशानी पैदा करता है। अष्टम राहु दुर्घटना कराता है एवं दुर्घटना की आंशका बनी रहती है।
उपाय : 108 राहु यंत्रों को जल में प्रवाहित करें।
9.शंखचूड़ कालसर्प योग : जब नवम् स्थान में राहु व तृतीय भाव में केतु बैठ जाए एवं बाकी ग्रह इन दोनों के दायी या बायी ओर हो तो जातक को सबसे ज्यादा नुकसान होता है। भाग्य साथ नहीं देता है। कार्य होता–होता रूक जाता है। हर कार्य में अड़चने आती रहती है। व्यवसाय में स्थायित्व की कमी बनी रहती है।
11.विषधर कालसर्प योग : जब ग्यारहवे स्थान में राहु व पंचम स्थान में केतु बैठ जाए एवं बाकी ग्रह इन दोनों के दायी या बायी ओर हो तो जातक को आर्थिक दृष्टि से परेशानी पैदा करता है। आय के श्रौत बन्द होते नजर आते है। आर्थिक स्थिति डांवाडोल सी रहती है। बड़े भाई का सहयोग प्राप्त नही हो पाता है एवं बांए कान की बीमारी से ग्रसित होने की आंशका रहती है। यदि राहु के साथ शुक्र व मंगल भी हो तो जातक/जातिका के अनेको प्रेम सम्बन्ध होते है। इस कालसर्प योग वाले जातक को यदि वह बिजनेसमैन है तो लाभ हेतु भारी मशक्कत उठानी पड़ती है। जहां लाभ होना चाहिए वहां हानि की आंशका बनी रहती है। बहुत से सार्थक प्रयास सफल नहीं हो पाते है।
उपाय : शनिवार को पीपल पर शिवलिंग चढ़ाये व मंत्र जाप करें (ग्यारह शनिवार तक)
12.शेषनाग कालसर्प योग : जब बारहवे स्थान में राहु व छठे स्थान में केतु बैठ जाए एवं बाकी ग्रह इन दोनों के दायी या बायी ओर हो तो जातक को नेत्र रोग होने की आंशका रहती है। यहां बैठकर राहु चर्मरोग, मानसिक परेशानियां एवं उदर विकार से प्रभावित करता है। एवं साथ ही साथ आर्थिक स्थिति को भी प्रभावित करता है। गुप्त शत्रुओ से भी परेशानी होती रहती है। शेषनाग कालसर्प योग जातक को शैय्या सुख में कमी आती है। साथ ही विदेश गमन का कार्यकम बनते–बनते अड़चने पैदा हो जायेगी।
उपाय : नव नाग स्तोत्र का पाठ उच्चारित करें।
उपाय क्या होते है व कैसे करने होते है :  उपाय हेतु अलग–अलग कालसर्प दोष हेतु अगल–अलग तरीके दिये गये है परन्तु कोई भी जातक किसी भी प्रकार के उपाय करते समय सावधानियां बरते, क्योंकि कुंडली में ग्रहो की स्थिति देखकर ही सटिक उपाय किये जाते है, उदाहरण स्वरूप यदि किसी की कुंडली में राहु लग्न में बैठकर कालसर्प योग का निर्माण कर रहा है, तो हमे अन्य ग्रहों की स्थिति पर भी विचार करना चाहिए। क्योकि एक बार उपाय करने के उपरान्त ग्रहों को एक साल के लिए स्थापित कर दिया जाता है। यदि किसी भी प्रकार से किसी अयोग्य ज्योतिषी से ग्रहों को स्थापित कराने में त्रुटि हो जाती है तो एक वर्ष के लिए उसके खराब फल अवश्य मिलेगे। अत: बड़ा ही सोच समझकर किसी योग्य ज्योतिषी से परामर्श करके कालसर्प दोष के उपाय करें।
कालसर्प दोष की शान्ति हेतु नक्षत्र, योग, दिन, दिशा एवं समय का विशेष ध्यान रखा जाता है, तभी उपाय भी फलीभूत होते है।
कालसर्प योग के बारें में भ्रमित होना : यदि किसी की कुंडली में राहु या केतु के साथ अन्य ग्रहों की युति है, तो फिर बिना सोचे समझे किसी की पत्री देखकर बिना डिग्री के कालसर्प योग कह देना गलत होगा। क्योकि कालसर्प योग का निर्माण तभी होता है, जब राहु केतु के घेरे में सभी ग्रह आ जाये। यदि किसी भी एक ग्रह की डिग्री राहु से कम है एव उसी घर में बैठे दूसरे ग्रह की डिग्री राहु से ज्यादा है तो फिर यह कालसर्प योग नहीं हुआ। कुछ ज्योतिषी यह कहकर भ्रमित कर देते है कि आंशिक कालसर्प योग है। परन्तु कालसर्प योग तो आंशिक होता ही नहीं है। यदि राहु–केतु के घेरे से एक भी ग्रह बाहर आ गया तो कालसर्प योग नही कहलाता है। कुछ ज्योतिषी उन्हें आंशिक के नाम पर भ्रमित कर उनसे पूजा पाठ के नाम पर मोटी रकम ऐंठ लेते है। जो कि गलत है। अत: इसमें भ्रमित होने की जरूरत नहीं है।



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